क्या पुरस्कार अब प्रकाशन-राजनीति का मोहरा बन गए हैं?

 डॉ. सत्यवान सौरभ नई दिल्ली।(आवाज न्यूज ब्यूरो)। “साहित्य समाज का दर्पण होता है।” यह वाक्य हमने न जाने कितनी बार पढ़ा और सुना है। परंतु आज साहित्य के दर्पण पर परतें चढ़ चुकी हैं—राजनीतिक, प्रकाशकीय और प्रतिष्ठान-प्रेरित परतें। प्रश्न यह नहीं है कि कौन किससे छप रहा है। प्रश्न यह है कि क्या हिंदी साहित्य…

कोचिंग का क्रेडिट, स्कूल की गुमनामी : शिक्षकों के साथ यह अन्याय कब तक?

नई दिल्ली।(आवाज न्यूज ब्यूरो)। आज कोचिंग संस्थानों को छात्रों की सफलता का सारा श्रेय मिलता है, जबकि वे शिक्षक गुमनाम रह जाते हैं जिन्होंने वर्षों तक नींव रखी। यह संपादकीय उसी विस्मृति की पीड़ा को उजागर करता है। स्कूल और कॉलेजों में पढ़ाने वाले शिक्षक सिर्फ परीक्षा नहीं, सोच, भाषा और संस्कार गढ़ते हैं। कोचिंग एक…

स्वतंत्र स्त्री का भय : हिंदी साहित्य का अपच

“हिंदी साहित्य की आँख में किरकिरी: स्वतंत्र स्त्रियाँ” हिंदी साहित्य जगत को असल स्वतंत्र चेता प्रबुद्ध स्त्रियां अभी भी हजम नहीं होती। उन्हें वैसी ही स्त्री लेखिका चाहिए जैसा वह चाहते हैं। वह सॉफ्ट मुद्दों पर लिखे, परिवार, समाज, कुछ मनोविज्ञान, स्त्री-पुरुष संबंध। आधुनिकता का या आधुनिक स्त्री का पर्याय उनके लिए वह है कि…

मेडिकल कॉलेज, कोरियावास के नामकरण का विरोध अनुचित

*निंदनीय है महर्षि च्यवन का अपमान : डॉ. ‘मानव’* नारनौल। (आवाज न्यूज ब्यूरो) ग्राम पंचायत, कोरियावास ने मेडिकल कॉलेज के लिए बिना शर्त उनासी एकड़ जमीन देकर बहुत ही सराहनीय कार्य किया था, लेकिन अब पंचायत सदस्यों तथा ग्रामवासियों द्वारा महर्षि च्यवन के नाम पर मेडिकल कॉलेज के नामकरण का विरोध करना तथा उनके नाम…

रंगमंच पर जाति का खेल : कितना जायज़?

कला का काम समाज को जागरूक करना है, उसकी विविधताओं को सम्मान देना है, और उस आईने की तरह बनना है जिसमें हर वर्ग खुद को देख सके। लेकिन जब कला सिर्फ कुछ खास वर्गों या समूहों की महिमा गाने लगे, और बाकी समाज की पीड़ा, संघर्ष और उपस्थिति को नज़रअंदाज़ कर दे, तो वह…

परिणाम चाहे जो भी हो, ईनाम देना जरूरी। 

“जनता का धन, निजी लाभ: खिलाड़ियों के इनाम पर सवाल” पदक नहीं मिला, पर ईनाम मिल गया — क्या यह नैतिकता है? चार करोड़ रुपये — एक बड़ी राशि है। यह पैसा किसी व्यक्तिगत कोष से नहीं आया, बल्कि यह जनता के खून-पसीने की कमाई है। क्या कोई भी सरकार अपनी मर्ज़ी से यह तय…

भारत कुमार को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि : मनोज कुमार – एक युग, एक विचार, एक भावना

“है प्रीत जहाँ की रीत सदा मैं गीत वहाँ के गाता हूँ भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ” -प्रियंका सौरभ नई दिल्ली। (आवाज न्यूज ब्यूरो) जब भी भारतभूमि से जुड़ी फिल्मों और कलाकारों की बात होती है, तो एक नाम स्वाभाविक रूप से मन में आता है – मनोज कुमार। यह नाम…

लेखक की स्वतंत्रता बनाम संपादकीय नीति : बहस के नए आयाम

संपादक आमतौर पर अनूठी और मौलिक रचनाएँ चाहते हैं ताकि उनकी पत्रिका की विशिष्टता बनी रहे। दूसरी ओर, लेखकों को यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे अपनी रचनाएँ अधिक से अधिक स्थानों पर भेज सकें, खासकर जब संपादक बिना किसी समयसीमा के रचनाओं को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार रखते हैं। साहित्य और प्रकाशन…

प्रसिद्धि की बैसाखी बनता साहित्य में चौर्यकर्म

हरियाणा के एक लेखक द्वारा राज्य गान के रूप में एक गीत के चयन को लेकर हाल ही में एक बहस छिड़ी है, जिस पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगाया गया है। अन्य लेखकों ने इस मामले पर अपनी चिंता व्यक्त की है और इसे राज्य के मुख्यमंत्री के ध्यान में लाया है। इस स्थिति…