क्या पुरस्कार अब प्रकाशन-राजनीति का मोहरा बन गए हैं?
डॉ. सत्यवान सौरभ नई दिल्ली।(आवाज न्यूज ब्यूरो)। “साहित्य समाज का दर्पण होता है।” यह वाक्य हमने न जाने कितनी बार पढ़ा और सुना है। परंतु आज साहित्य के दर्पण पर परतें चढ़ चुकी हैं—राजनीतिक, प्रकाशकीय और प्रतिष्ठान-प्रेरित परतें। प्रश्न यह नहीं है कि कौन किससे छप रहा है। प्रश्न यह है कि क्या हिंदी साहित्य…
