सरकार से सवाल पूछने पर छात्रों को सजा की धमकी देना असंवैधानिक : जस्टिस उज्जवल भुइयां

नई दिल्ली। (आवाज न्यूज़ ब्यूरो)। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में छात्रों को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जवल भुइयां ने कहा, ‘जो छात्र सवाल पूछते हैं या सरकार से अलग पॉइंट ऑफ़ व्यू रखते हैं उन्हें सज़ा देने की धमकी देना असंवैधानिक है।
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जवल भुइयां ने छात्रों के हक की बात की है। उन्होंने कहा, ‘जो छात्र सवाल पूछते हैं या सरकार से अलग पॉइंट ऑफ़ व्यू रखते हैं उन्हें सज़ा देने की धमकी देना असंवैधानिक है।’ अगर प्रशासन या सरकार केवल आवाज़ उठाने की वजह से छात्रों को धमकी देते हैं तो ये सत्ता का दुरुपयोग है। उन्होंने साफ कहा कि लोकतंत्र में सवाल पूछना विद्रोह का प्रतीक नहीं है। जस्टिस उज्जवल भुइयां 30 अगस्त को दिल्ली स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में शामिल हुए थे। एलएलएम बैच का 13 वां दीक्षांत समारोह था। इसी दौरान छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने ये बातें कहीं।
लोकतंत्र में सवाल पूछना विद्रोह का प्रतीक नहीं है बल्कि जनता का सत्ता से सवाल पूछना संवैधानिक जिम्मेदारी है। जब छात्र सवाल पूछते हैं तब उन्हें सज़ा देने की धमकी नहीं दी जा सकती है। ये संविधान के खिलाफ है। साथ ही साथ अपने पद और शक्ति का भी दुरुपयोग है। लोकतंत्र में आप ये मानकर नहीं चल सकते कि सबकी विधारधारा एक जैसी होगी। आपको ये समझना होगा कि आपस में मतभेद तो होंगे ही और उन्हें साथ लेकर कैसे आगे बढ़ना है ये सोचना चाहिए। संविधान के दायरे में रहते हुए अलग-अलग विचारों को साथ लाना होगा और एक यूनिवर्सिटी से बेहतर इसकी शुरुआत कहीं और नहीं हो सकती। जब छात्रों को कॉलेज में लॉ पढ़ाया जाता है तो उन्हें सवाल पूछने का पूरा हक मिलना चाहिए। पूछा जाना चाहिए कि किसी केस में पीड़ित को न्याय मिला या नहीं। अलग-अलग एंगल से डिबेट करना चाहिए। संविधान ये नहीं कहता कि सबके विचार एक जैसे होने चाहिए बल्कि ये सिखाता है कि सरकार को जनता की सुननी चाहिए, जनता को एक-दूसरे की और प्रशासन को समाज की। अगर किसी व्यक्ति में सुनने की शक्ति नहीं है तो वो एक तरह से हिंसा को बढ़ावा दे रहा है।
जस्टिस भुइयां की कही मुख्य बातें
जस्टिस भुइयां ने अपनी स्पीच में कहा,
लोकतंत्र में सवाल पूछना विद्रोह का प्रतीक नहीं है बल्कि जनता का सत्ता से सवाल पूछना संवैधानिक जिम्मेदारी है। जब छात्र सवाल पूछते हैं तब उन्हें सज़ा देने की धमकी नहीं दी जा सकती है। ये संविधान के खिलाफ है। साथ ही साथ अपने पद और शक्ति का भी दुरुपयोग है।
लोकतंत्र में आप ये मानकर नहीं चल सकते कि सबकी विधारधारा एक जैसी होगी। आपको ये समझना होगा कि आपस में मतभेद तो होंगे ही और उन्हें साथ लेकर कैसे आगे बढ़ना है ये सोचना चाहिए। संविधान के दायरे में रहते हुए अलग-अलग विचारों को साथ लाना होगा और एक यूनिवर्सिटी से बेहतर इसकी शुरुआत कहीं और नहीं हो सकती।
जब छात्रों को कॉलेज में लॉ पढ़ाया जाता है तो उन्हें सवाल पूछने का पूरा हक मिलना चाहिए। पूछा जाना चाहिए कि किसी केस में पीड़ित को न्याय मिला या नहीं। अलग-अलग एंगल से डिबेट करना चाहिए।
संविधान ये नहीं कहता कि सबके विचार एक जैसे होने चाहिए। बल्कि ये सिखाता है कि सरकार को जनता की सुननी चाहिए, जनता को एक-दूसरे की और प्रशासन को समाज की। अगर किसी व्यक्ति में सुनने की शक्ति नहीं है तो वो एक तरह से हिंसा को बढ़ावा दे रहा है।
अचानक ये मुद्दा क्यों?
जस्टिस भुइयां की ये बातें बार कॉउन्सिल ऑफ़ इंडिया से जाकर जुड़ती हैं। कुछ दिन पहले बीसीआई ने एक नोटिस जारी किया था। इस नोटिस में कहा गया कि नालसार यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों को राज्य बार कॉउन्सिल में दाखिला न दिया जाए। ये यूनिवर्सिटी हैदराबाद में है। यहां करीब 450 छात्र सीजेआई सूर्यकांत को अपने कॉलेज में बतौर चीफ गेस्ट बुलाए जाने पर विरोध जता रहे थे। इसी बीच बीसीआई ने ये नोटिस जारी किया था। बाद में वापस भी ले लिया गया।
इस घटनाक्रम के बाद अब जस्टिस भुइयां ने ये बातें कही हैं। उनका मानना है कि अगर लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करना है, जहां विचारों में मतभेद की आज़ादी हो, तो इसकी नींव यूनिवर्सिटी में ही रखनी होगी।