सीमित संसार से असीमित कल्पना तक: बाल-पठन संस्कृति का संकट
-डॉ. सत्यवान सौरभ नई दिल्ली।(आवाज न्यूज ब्यूरो) एक समय ऐसा भी था, जब मुझे बाल-पत्रिकाओं के अस्तित्व की कोई जानकारी नहीं थी। यह जानना तो दूर, मुझे इस बात का आभास तक नहीं था कि विद्यालयी पाठ्यक्रम की पुस्तकों के अतिरिक्त भी बच्चों के लिए विशेष रूप से कुछ लिखा-पढ़ा जाता है। हमारे लिए पढ़ना केवल…
