अंतत: धनखड़ भी सतपाल मलिक ही साबित हुए..

बृजेश चतुर्वेदी

नई दिल्ली।(आवाज न्यूज ब्यूरो)। पिछले काफी समय से धनकड़ साहब बीजेपी के विरोधियों से लगातार सार्वजनिक और व्यक्तिगत रूप से मिल रहे थे वह कई बार भाजपा को झटका दे चुके थे लेकिन पहला मजबूत झटका भाजपा सरकार को तब लगा जब धनकड़ साहब ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में शिवराज सिंह चौहान को लगभग बेइज्जत किया।

दूसरा बड़ा झटका भाजपा सरकार को लगा जब केंद्र सरकार जस्टिस वर्मा के खिलाफ लोकसभा में महाभियोग लेकर आई। केंद्र सरकार की योजना थी कि लोकसभा स्पीकर की अगुवाई में जस्टिस वर्मा को हटाने की प्रक्रिया होगी और ये कार्य केंद्र सरकार करेगी।

तभी राज्यसभा में वो हुआ, जिसने भाजपा नीत केंद्र सरकार को हिला दिया। धनखड़ साहब ने अचानक राज्यसभा में जस्टिस वर्मा के ख़िलाफ़ विपक्ष द्वारा लाए गए महाभियोग के नोटिस को स्वीकार कर लिया। इस नोटिस पर 63 सांसदों के साइन थे और ये सभी सांसद विपक्ष के थे। धनखड़ साहब ने ये सब तब किया, जब राज्यसभा में नेता सदन जेपी नड्डा और वरिष्ठ मंत्री अनुपस्थित थे। सिर्फ क़ानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और जी किशन रेड्डी थे। अपनी सरकार को बिना विश्वास में लिए धनखड़ साहब ने विपक्ष का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, मेघवाल और रेड्डी के चेहरे की हवाइयां उड़ गई। केंद्र सरकार जहां लोकसभा में प्रस्ताव लाकर जस्टिस वर्मा को हटाने की प्रक्रिया का नेतृत्व कर न्यायिक सुधार की बड़ी मिसाल पेश करने जा रही थी, तभी धनखड़ साहब ने राज्यसभा के माध्यम से इसमें विपक्ष की भी एंट्री करा दी। केंद्र के सूत्रों की मानें तो ये सब जस्टिस वर्मा को बचाने की योजना का हिस्सा था क्योंकि विपक्ष के कई नेता जस्टिस वर्मा को हटाने के विरोध में बोल चुके थे।

जो धनखड़ साहब मीडिया के सामने न्यायिक गंदगी के खिलाफ हुंकार भर रहे थे, वही धनखड़ साहब राज्यसभा में विपक्ष के एजेंडे को बढ़ाकर जस्टिस वर्मा को बचाने की प्रक्रिया का हिस्सा बन गए थे। इसके साथ ही विपक्ष प्रयागराज हाईकोर्ट के जज जस्टिस शेखर यादव को हटाने के लिए महाभियोग लाने जा रहा था, जिन्होंने विश्व हिन्दू परिषद के कार्यक्रम में कहा था कि यह देश कठमुल्लों से नहीं चलेगा। उपराष्ट्रपति धनखड़ साहब विपक्ष के इस प्रस्ताव को स्वीकार करने को तैयार हो गए थे। मंगलवार को विपक्ष का यह प्रस्ताव आना था। केंद्र को इसकी कोई जानकारी नहीं थी।

इसका अर्थ यह हुआ कि जो केंद्र सरकार लोकसभा के माध्यम से जस्टिस वर्मा को हटाने जा रही थी, धनखड़ साहब ने राज्यसभा के माध्यम से उसमें विपक्ष को शामिल कर जस्टिस वर्मा को बचाने की पिच तैयार कर दी थी। वहीं जो केंद्र सरकार जस्टिस शेखर यादव को बचाने में लगी थी, धनखड़ साहब केंद्र को बताए बिना विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार कर जस्टिस यादव को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने वाले थे अर्थात धनखड़ साहब विपक्ष की उस प्रक्रिया का हिस्सा बन गए थे, जिसके तहत नोटों के बोरे के मामले में फंसे जस्टिस वर्मा को बचाया जाना था और संघ के आनुवांशिक संगठन विहिप के मंच से हिंदुत्व की हुंकार भरने वाले जस्टिस शेखर यादव को हटाया जाना था और ये उस भाजपा की सरकार में किए जाने का षड्यंत्र था, जो भाजपा आरएसएस का ही आनुवंशिक संगठन है। सोचिए कि ये आरएसएस, बीजेपी, विहिप और पीएम मोदी के लिए कितनी शर्म की बात होती कि वीएचपी के मंच से हिंदुत्व की बात करने वाले जज को बीजेपी की सरकार में विपक्ष द्वारा बीजेपी के बनाए उपराष्ट्रपति के सहयोग से हटा दिया जाता ?

यही कारण था कि विपक्ष पिछले दो-तीन महीने से आक्रामक था क्योंकि राज्यसभा के सभापति शायद उनके अपने हो चुके थे। संभवतः विपक्ष की योजना थी कि राज्यसभा में केंद्र सरकार के बिल रोके जाएंगे, सरकार को राष्ट्र के सामने शर्मशार किया जाएगा।

सरकार को समय रहते इसकी भनक लग गई. इसके बाद राजनाथ सिंह के कार्यालय में 10-10 के ग्रुप में एनडीए के सांसद बुलाए गए और कोरे कागज पर साइन कराए गए। ये साइन उस स्थिति के लिए थे कि अगर धनखड़ साहब नहीं माने तो उन्हें सरकार महाभियोग लाकर हटा देगी।

इसके बाद रात 8 बजे के बाद धनखड़ साहब को एक कॉल गया। कॉल पर बहस हुई, धनखड़ साहब को संदेश दिया गया कि सांसदों के साइन हो चुके हैं। अब आपको तय करना है। इसके बाद धनखड़ साहब ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफ़ा दे दिया।

जो विपक्ष धनखड़ साहब को झुकी कमर, संघी जाट, लोकतंत्र का भक्षक बता रहा था, उनके इस्तीफे पर वही विपक्ष उन्हें लोकतंत्र का रक्षक बताते हुए रुदन कर रहा है और जिन पीएम मोदी ने हामिद अंसारी जैसे उपराष्ट्रपति की विदाई पर उनके सम्मान में भाषण दिया था, ग़ुलाम नबी आज़ाद की विदाई पर भावुक हो गए थे उन पीएम मोदी ने धनखड़ साहब की विदाई पर सिर्फ़ ये लिखा कि उन्हें बहुत से बड़े पदों पर काम करने का मौक़ा मिला है, वो जल्दी स्वस्थ हों। पीएम ने न तो धनखड़ साहब के योगदान की सराहना की और न कुछ ज़्यादा लिखा। पीएम के अलावा बीजेपी के किसी नेता ने धनखड़ साहब के इस्तीफे पर एक शब्द तक नहीं लिखा है।

इससे आप समझ सकते हैं कि केंद्र सरकार धनखड़ साहब से पीछा छूटने पर राहत महसूस कर रही है क्योंकि केंद्र को लगता है कि धनखड़ साहब उसे धोखा दे रहे थे। अब भाजपा को शायद समझ आ जाए कि जब किसी नेता को निर्णायक जिम्मेदारी दी जाए तो उसका बैकग्राउंड आरएसएस का हो न कि किराए का आयातित नेता का। भाजपा ने दूसरे दलों से जितने भी आयातित किए हैं, उसमें 80% से अधिक या तो नकारा हैं या फिर एक समय पर धोखा दे गए है। मोदी ने आयातित जाटों पर बार-बार भरोसा किया लेकिन 2 बार पीठ मे खंजर खाने के बाद मोदी सरकार को अब किसी अन्य आयातित जाट नेता को किसी महत्वपूर्ण पद पर बैठाने से पहले 1000 बार सोचना पड़ेगा।