बृजेश चतुर्वेदी
लखनऊ।(आवाज न्यूज ब्यूरो) राहुल गांधी जिस आक्रामकता के साथ देश भर में 90% आबादी की बात करते हैं, जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक एवं सामान्य वर्ग के पिछड़े लोग शामिल हैं। यही बात अखिलेश यादव पीडीए के नारे के साथ राहुल गांधी का समर्थन करते हैं। आबादी के अनुसार लाभ दिलाने के लिए जाति जनगणना कराने की मांग राहुल और अखिलेश लगातार कर रहे हैं, जिसे केंद्र सरकार ने स्वीकार भी कर लिया है। 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा बहुमत से 32 सीटें दूर रह गई, इसका श्रेय उत्तर प्रदेश को जाता है। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सीटें 2019 की तुलना में 30 कम हो गईं। मात्र 33 सीटें ही मिलीं, जबकि सपा को 37 तथा कांग्रेस को 6 सीटें मिलीं। इसके पीछे यही माना जा रहा है कि जातीय गोलबंदी और आरक्षण खत्म करने का बनाया गया परसेप्शन काफी सफल रहा, जिससे भाजपा को काफी नुकसान हुआ।
2027 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हैं। इसे लेकर भाजपा जातीय समीकरण बनाने में जुटी है, क्योंकि अब हिंदुत्व एजेंडा इतना ताकतवर नहीं रहा कि वह भाजपा की बहुमत की सरकार बनवा सके। इसलिए भाजपा और मोदी दोनों के लिए ऐसी स्थिति राहुल-अखिलेश ने पैदा कर दी कि वे उनके एजेंडे पर आने के लिए मजबूर हो गए। इसका उदाहरण जातीय जनगणना और 13 जनवरी 2026 को लाया गया यूजीसी का बिल है। बिना सोचे-समझे मोदी सरकार लगातार ऐसे निर्णय ले रही है, जिन पर राहुल-अखिलेश का दबाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। इसी दबाव के कारण यूजीसी का बिल लाया गया, जिसको लेकर सामान्य वर्ग आंदोलित हुआ। बिल में बहुत सारी खामियाँ थीं, जिस पर उच्चतम न्यायालय ने भी रोक लगा दी और अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी। सुप्रीम कोर्ट से रोक लगने के बाद यूजीसी बिल से लाभान्वित होने वाला वर्ग भी आंदोलित है। कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि बिना सोचे-समझे और जल्दबाजी में जातीय समीकरण साधने के चक्कर में भाजपा सरकार उलझती जा रही है।
