बंगाल में पब्लिक ने भाजपा प्रत्याशी शुभेन्द्र सरकार को दौडा-दौडाकर पीटा और कबीर पर बरसे पत्थर

नई दिल्ली।(आवाज न्यूज ब्यूरो)।  बंगाल के दक्षिण दिनाजपुर के कुमारगंज से भाजपा विधायक का चुनाव लड़ रहे शुभेंद्र सरकार को पब्लिक ने बुरी तरह पीट दिया और कबीर पर बरसे पत्थर इस घटना ने कई मुद्दे सामने आ गये हैं।
पहला तो वोट हासिल करने के लिए किसी भी पार्टी के प्रत्याशी को अभद्र और उत्तेजक व्यवहार नहीं करना चाहिए, जिससे बाद में पब्लिक मौका मिलते ही उस पर टूट पड़े। उसके बाद दूसरी बात यह कि केंद्रीय चुनाव आयुक्त ज्ञानेश की निजी इच्छा-अभिलाषा के साथ ही उनकी भाजपा समर्पित तथा टीएमसी विरोधी कार्रवाइयों को लेकर चल रहे आरोपों के बावजूद इस चुनाव के दौरान पुलिस की कोई व्यवस्था भी नहीं हो पायी। केवल एक सिपाही ही बूथ के सामने दिखा, जबकि दावा था कि बंगाल में टीएमसी को नेस्तनाबूत करने के लिए अर्द्धसैनिक बलों के साथ ही भारी पुलिस तैनाती रहेगी जिसमें टैंक भी परेड करेंगे। तीसरी बात यह ज्ञानेश को इस घटना के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया जाना चाहिए कि क्योंकि वे इस चुनाव में अपनी बड़बोली हरकतों के बावजूद तनाव को रोक पाने में असफल रहे। चौथी बात यह कि पब्लिक को भी सोचना चाहिए कि उसे इस तरह मुंह-मुंह पर मुक्का मारने से परहेज करना चाहिए। अब शुभेंदु अपना सूजा हुआ मुंह किस मुंह से दूसरों के सामने आयेंगे। अरे मारना भी था, तो शरीर के दूसरे हिस्सों पर भी मार-पिटाई की जा सकती थी। पांचवीं बात यह कि शुभेंदु सरकार ही नहीं, बल्कि सभी नेताओं को अपनी हरकतों, कमीशनखोरी, बवाल, झंझट और दलबदल करने वाली डीएनए सम्बन्धी स्वाभाविक और चारित्रिक कवायदों के साथ ही ऐन वक्त पर मैराथन की तरह दौड़ जाने की प्रैक्टिस जरूर करानी चाहिए। छठवीं बात यह कि शुभेंदु को बचाने वाले सिपाही को राष्ट्रपति मेडल देकर उसे सीधे डिप्टी एसपी बना दिया जाना चाहिए। क्योंकि उसने अपनी जान पर खेल कर शुभेदु को भीड़ से बचाने की भरसक कोशिश की। और सातवीं बात यह कि बंगाल के मतदाताओं के ताजा तेवरों से साफ हो गया है कि बंगाल में केवल कोई लकड़बग्घों का झुंड नहीं, बल्कि बंगाल-टाइगर ममता बनर्जी को हरा पाना किसी भी दल के वश की बात नहीं है और आखिरी आठ बात यह कि पत्रकारों को प्रशस्ति पत्र दिया जाना चाहिए कि वे कवरेज करने में अच्छी खासी दौड़ कर सकते हैं।