झूठी-साज़िश गढ़ रहे, , फैलाएँ भ्रम-जाल। सजग रहे जन-गण सभी, विफल करें हर चाल॥

सदा देश की एकता, इनको अखरे पार्थ।

भेदभाव की आग से, सेके अपना स्वार्थ॥

राष्ट्रहितों को छोड़कर, करते केवल शोर।

जनता समझे भेद सब, अब न चलेगा जोर॥

बात-बात पर खोजते, नित नया विवाद।

मिल-जुलकर रहना मगर, देश रहे आबाद॥

स्वार्थ-सिद्धि की चाह में, बाँटें जाति-समाज।

प्रेम-सद्भावों से बने, भारत का सिरताज॥

अफवाहों के पंख पर, उड़ते इनके बोल।

सत्य-सूर्य के सामने, खुलते सारे खोल॥

नफ़रत के व्यापार से, मिलता कब सम्मान।

प्रेम-एकता से बढ़े, भारत की पहचान॥

जन-मन को बरगला सकें, इतना नहीं आसान।

सत्य खड़ा है साथ में, लेकर दृढ़ अभियान॥

‘सौरभ’ मिलकर देश का, रखें सभी हम मान।

एकजुट होकर बढ़े, अपना हिन्दुस्तान॥