लाठीचार्ज और पुलिस हिंसा की जांच करेगी 3 सदस्यीय समिति: सुप्रीम कोर्ट ने दिए निर्देश

नई दिल्ली।(आवाज न्यूज़ ब्यूरो)। सीजेआई ने कहा कि आपराधिक आचरण से जुड़े आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है और उन्हें उनके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाना होगा, भले ही इसके लिए कोई भी जिम्मेदार हो।
उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि वह कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान कथित बर्बरतापूर्ण लाठीचार्ज और पुलिस बल के खिलाफ हिंसा जैसे दावों की स्वतंत्र रूप से जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन करेगा। इस समिति में सर्वाेच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी शामिल होंगे।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत के अध्यक्षता और न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहन की सदस्यता वाले पीठ ने कहा कि समिति तथ्यों की पूर्ण पड़ताल करेगी और तय समय पर अदालत को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। अदालत ने कहा कि पीड़ितों को समिति से संपर्क करने का अवसर दिया जाएगा।
पीठ ने यह भी आश्वासन दिया कि समिति को आवश्यक लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। इस समिति की जांच के निष्कर्षों और सिफारिशों पर ही अदालत आगे की कार्रवाई करेगी। यह समिति महिला प्रदर्शनकारियों को लक्षित कर यौन उत्पीड़न और ऑनलाइन उत्पीड़न के आरोपों की भी जांच करेगा। साथ ही सोशल मीडिया आधारित उत्पीड़न संबंधी आरोपों की जांच की जाएगी।
पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से उन प्राथमिकी की जानकारी मांगी, जिनमें छात्र प्रदर्शनकारियों को आरोपी बनाया गया है और उन मामलों को रद्द किया जाना है। इससे संकेत मिलता है कि अदालत संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर सकती है। पीठ ने छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले रद्द करने का विरोध कर रहे एक वकील से कहा, ‘छात्रों का भविष्य दांव पर है। हमें इस पर विचार करना होगा। उनका पूरा भविष्य सामने है। उन्हें अनुच्छेद 19 के तहत प्रदर्शन करने का अधिकार है।’
मेहता ने कहा कि पुलिस ने 2,800 से अधिक ऐसे ‘असामाजिक तत्त्वों’ की पहचान की है, जो पहले गंभीर अपराधों में शामिल रहे हैं और 20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार थे। शीर्ष अदालत ने 3 अगस्त को इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया था कि प्रदर्शनकारी छात्रों को रिहा करने के उसके आदेश में ‘आपराधिक इतिहास’ शब्द का जिक्र किया गया है, जिसका मतलब सिर्फ उन लोगों से है, जो गंभीर तथा जघन्य अपराधों में शामिल थे। सीजेआई ने कहा कि आपराधिक आचरण से जुड़े आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है और उन्हें उनके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाना होगा, भले ही इसके लिए कोई भी जिम्मेदार हो।