अमेरिका मध्यावधि चुनाव : भारतीयों ने डुबोई ट्रंप की लुटिया,महंगा पडा पाकिस्तान से प्रेम

नई दिल्ली।(आवाज न्यूज ब्यूरो) । अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को लगे झटके के बीच भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं का बदला रुख भी चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। कभी ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी की ओर आकर्षित होते दिखाई देने वाले भारतीय मूल के अमेरिकी मतदाताओं का समर्थन अब डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ बढ़ता नजर आ रहा है। ट्रंप की पाकिस्तान के साथ नजदीकी, भारत के खिलाफ बयानबाजी, एच-1 बी वीजा पर सख्ती और ड।ळ। समर्थकों की भारतीयों के खिलाफ टिप्पणियों ने इस नाराजगी को हवा दी है। कार्नेगी एंडोमेंट और यूगोव के सर्वे में 62 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकी नागरिकों ने डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को समर्थन देने की इच्छा जताई है।
ट्रंप की पाकिस्तान से दोस्ती पर उठे सवाल
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर कई बार तनावपूर्ण बयानबाजी देखने को मिली। खासकर ऑपरेशन सिंदूर के बाद ट्रंप की ओर से भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम कराने का श्रेय लेने और बार-बार मध्यस्थता का दावा करने से भारत में असहजता पैदा हुई। दूसरी तरफ पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर के साथ ट्रंप की मुलाकातों और उनकी नजदीकी ने भी भारतीय समुदाय के एक हिस्से में सवाल खड़े किए। भारत के प्रति ट्रंप के पुराने सकारात्मक रुख और दूसरे कार्यकाल की नीतियों के बीच अंतर को कुछ भारतीय-अमेरिकी मतदाता महसूस करने लगे।
भारत विरोधी बयानबाजी ने बढ़ाई नाराजगी
भारतीय-अमेरिकी समुदाय में असंतोष की एक बड़ी वजह ट्रंप के राजनीतिक आंदोलन मागा से जुड़े कुछ समर्थकों की भारतीयों के खिलाफ टिप्पणियां भी हैं। इसका चर्चित उदाहरण टेक्सस में सामने आया, जहां रिपब्लिकन उम्मीदवार बो फ्रेंच ने यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के दक्षिण एशियाई मूल के छात्रों की तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की थी। उन्होंने तस्वीर के साथ टिप्पणी करते हुए सवाल उठाया था कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों में विदेशी लोगों की संख्या इतनी अधिक क्यों दिखाई दे रही है। उनकी पोस्ट के बाद भारतीय मूल के छात्रों और अन्य दक्षिण एशियाई समुदायों में नाराजगी फैल गई।इस विवाद ने अमेरिका में भारतीयों की पहचान, नागरिकता और समाज में उनके योगदान को लेकर बहस छेड़ दी। खास बात यह थी कि तस्वीर में मौजूद सभी लोगों की नागरिकता जाने बिना उन्हें विदेशी बताने पर भी सवाल उठे। टेक्सस के कई रिपब्लिकन नेताओं ने भी फ्रेंच की टिप्पणियों की आलोचना की थी।
एच-1 बी वीजा और आव्रजन नीतियां भी बनीं वजह
भारतीय-अमेरिकियों के राजनीतिक रुझान में बदलाव के पीछे आव्रजन नीतियां भी महत्वपूर्ण मुद्दा हैं। अमेरिका में बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर एच-1 बी वीजा के जरिए काम करते हैं। ट्रंप प्रशासन के दौरान कुशल विदेशी कर्मचारियों के वीजा नियमों और उनसे जुड़ी लागत को लेकर सख्ती की गई। इसका असर भारतीय आईटी पेशेवरों, उनके परिवारों और अमेरिका में बेहतर रोजगार की उम्मीद लेकर पहुंचे युवाओं पर पड़ा। एच-1 बी वीजा को लेकर राजनीतिक बहस ने भारतीय समुदाय में यह चिंता बढ़ाई कि क्या अमेरिका में उनके रोजगार और भविष्य को लेकर नीतियां पहले जैसी अनुकूल रहेंगी।कार्नेगी के सर्वे में भी ट्रंप प्रशासन की आव्रजन नीति, घरेलू अर्थव्यवस्था और भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर असंतोष सामने आया है।
कार्नेगी-यूगोव के सर्वे में सामने आया बड़ा बदलाव
कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस ने शोध संस्था यूगोव के साथ मिलकर अक्टूबर 2026 में भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं के बीच सर्वे किया। इसमें 1,000 भारतीय-अमेरिकी वयस्कों को शामिल किया गया। सर्वे 7 से 27 अक्टूबर के बीच किया गया था। कांग्रेस चुनाव में मतदान की मंशा से जुड़े आंकड़ों में अमेरिकी नागरिकों के जवाब शामिल हैं।
सर्वे के प्रमुख आंकड़े इस प्रकार हैं
62 प्रतिशत से अधिक भारतीय-अमेरिकी नागरिकों ने डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को वोट देने की इच्छा जताई।
केवल 19 प्रतिशत ने रिपब्लिकन उम्मीदवारों का समर्थन किया।
12 प्रतिशत मतदाता असमंजस में थे।
5 प्रतिशत ने मतदान नहीं करने की बात कही।
2 प्रतिशत ने अन्य उम्मीदवारों का समर्थन किया।
सर्वे के मुताबिक, 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में 62 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकियों ने कमला हैरिस और 30 प्रतिशत ने डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन किया था। जनवरी 2026 में डेमोक्रेटिक समर्थन 57 प्रतिशत और ट्रंप के पक्ष में समर्थन 25 प्रतिशत था।
सर्वे का एक और दिलचस्प पहलू
अक्टूबर के सर्वे में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के पक्ष में 43 प्रतिशत अंकों का अंतर दिखाई दिया। हालांकि, 2024 के आंकड़े राष्ट्रपति चुनाव की पसंद से जुड़े हैं, जबकि 2026 के आंकड़े कांग्रेस चुनाव में मतदान की मंशा बताते हैं। सर्वे का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों का समर्थन करने वाले सभी मतदाता पार्टी की नीतियों से ही प्रभावित नहीं हैं।कार्नेगी-यूगोव के सर्वे के मुताबिक, डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को समर्थन देने की इच्छा जताने वाले 65 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकी नागरिकों ने कहा कि उनका फैसला मुख्य रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी या उम्मीदवार के समर्थन पर आधारित है। वहीं 35 प्रतिशत ने माना कि उनका फैसला मुख्य रूप से रिपब्लिकन उम्मीदवारों या पार्टी के विरोध से प्रभावित है।
भारतीय मूल के उम्मीदवारों की जीत
मध्यावधि चुनाव में भारतीय मूल के कई उम्मीदवारों ने भी अपनी जीत दर्ज कर अमेरिकी राजनीति में समुदाय की बढ़ती भागीदारी दिखाई है। डेमोक्रेटिक उम्मीदवार सुहास सुब्रमण्यम ने वर्जीनिया से अपनी सीट बरकरार रखी, जबकि पिया दांडिया ने फ्लोरिडा के 22 वें कांग्रेस क्षेत्र से जीत हासिल कर पहली बार अमेरिकी कांग्रेस में जगह बनाई। इसके अलावा रो खन्ना, अमी बेरा और प्रमिला जयपाल भी प्रतिनिधि सभा में दोबारा निर्वाचित हुए। दूसरी तरफ रिपब्लिकन उम्मीदवार विवेक रामास्वामी को ओहायो के गवर्नर चुनाव में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एमी एक्टन से हार का सामना करना पड़ा।