लखनऊ।(आवाज न्यूज ब्यूरो)। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने निजीकरण के मसले पर कर्मचारियों का पक्ष रखने के लिए नियामक आयोग से समय मांगा है। संघर्ष समिति ने दावा किया है कि अगर पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों का निजीकरण हुआ तो 16,500 नियमित और 60,000 संविदा कर्मचारियों की छंटनी होगी। संघर्ष समिति ने आयोग से निजीकरण का प्रस्ताव रद्द करने की भी मांग की है।
संघर्ष समिति के संयोजक शैलेंद्र दुबे ने कहा कि बिजली कर्मचारी और बिजली उपभोक्ता बिजली के सबसे बड़े हितधारक हैं। ऐसे में निजीकरण पर कोई फैसला देने से पहले दोनों पक्षों का सुना जाना जरूरी है। संघर्ष समिति बिजली कर्मचारियों का पक्ष रखने के लिए तैयार है। नियमित और संविदा कर्मचारियों की छंटनी के अलावा निजीकरण से कर्मचारियों व अभियंताओं को और भी नुकसान होंगे। बड़े पैमाने पर अभियंताओं और अन्य कर्मचारियों को रिवर्शन का सामना करना पड़ेगा। निजीकरण का फैसला कर्मचारियों को अंधेरे में डाल देने वाला है। निजीकरण का प्रस्ताव अनिवार्य तौर पर निरस्त कर देना चाहिए। संघर्ष समिति ने निजीकरण का प्रस्ताव रद्द होने तक विरोध प्रदर्शन जारी रखने का ऐलान किया है।
निजीकरण पर उपभोक्ता परिषद ने सरकार के सामने रखे छह सवाल
पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण पर राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने सरकार और पावर कॉरपोरेशन से छह सवाल पूछे हैं। उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि अगर इस मसले पर सरकार निष्पक्षता से फैसला लेना चाहती है, तो उसे एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय समिति का गठन करके सभी पक्षों से बात करनी चाहिए। उपभोक्ता परिषद का मत स्पष्ट है कि निजीकरण उपभोक्ताओं के हितों के विपरीत है। इससे न केवल उपभोक्ताओं को नुकसान होगा बल्कि प्रदेश को वित्तीय हानि भी होगी। सरकार को जवाब देना चाहिए कि बिजली कंपनियों पर उपभोक्ताओं की बकाया राशि 33,122 करोड़ रुपये निजीकरण के बाद कैसे मिलेगी? पूर्वांचल और दक्षिणांचल पर यह बकाया रकम तकरीबन 16 हजार करोड़ रुपये है। उपभोक्ताओं से वसूली जाने वाली 65,909 करोड़ रुपये निजी कंपनियां क्या वसूलकर पावर कॉरपोरेशन को देंगी? टोरेंट ने उपभोक्ताओं से वसूले गए रुपये 2200 करोड़ क्यों नहीं लौटाए? यदि निजी कंपनियां आएंगी तो क्या वे किसानों को निःशुल्क बिजली देंगी? क्या प्रदेश सरकार किसी निजी कंपनी को सब्सिडी देगी? यदि नहीं, तो सामाजिक योजनाओं का भविष्य क्या होगा? क्या सरकार लिखित आश्वासन दे सकती है कि अगले पांच वर्षों तक बिजली दरों में कोई वृद्धि नहीं होगी, जैसा कि सरप्लस की स्थिति में हो सकता है?
यूपी में बिजली विभाग के 16,500 नियमित और 60 हजार संविदा कर्मियों की नौकरी पर संकट