बृजेश चतुर्वेदी
लखनऊ।(आवाज न्यूज ब्यूरो) भाजपा का प्रदेश संगठन मीडिया बाजी में उलझ गया है। नव निर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के एक पत्र ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अनचाहा तूफान खड़ा कर दिया है। ऐसा लगता है कि दही के चक्कर में चूना खा गये। पार्टी के भीतर ब्राह्मण विधायकों को लेकर लिखे गए पत्र को मीडिया और राजनीतिक विरोधियों ने जिस तरह प्रस्तुत किया, उससे पंकज चौधरी की छवि पर सवाल खड़े हो गए हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि संगठन के एक आंतरिक विषय को सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनाकर उन्हें ब्राह्मण समाज के विरोधी के रूप में पेश करने की कोशिश की गई।
जानकारों का मानना है कि प्रदेश अध्यक्ष पद संभालते ही पंकज चौधरी अनुभवहीनता और अतिउत्साही सलाहकारों के घेरे में आ गए। सात बार सांसद रहने के बावजूद संगठनात्मक राजनीति उनके लिए नया क्षेत्र है। ऐसे में जो निर्णय अंदरखाने सुलझाए जाने थे, वे मीडिया की सुर्खियों में आ गए। पार्टी के भीतर ही कुछ लोगों ने इसे ‘वाहवाही लूटने की मीडिया बाजी’ का रूप दे दिया, जिसका खामियाजा सीधे अध्यक्ष को भुगतना पड़ रहा है।
पंकज चौधरी ने पद संभालने के बाद अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कहा था कि वे सभी को साथ लेकर चलने वाले नेता हैं और दांव-पेंच की राजनीति में विश्वास नहीं रखते। लेकिन उनके इसी सीधेपन को कुछ लोगों ने हथियार बना लिया। संगठन के जानकार बताते हैं कि अध्यक्ष के आसपास मौजूद लोग न तो उन्हें सही सलाह दे पा रहे हैं और न ही संभावित राजनीतिक नुकसान का अंदाजा लगा पा रहे हैं।
इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम सवाल यह है कि क्या यह पत्र ब्राह्मण समाज के खिलाफ था या कुछ विधायकों के संदर्भ में संगठनात्मक संदेश मात्र? भाजपा की ओर से अब तक यह स्पष्ट संदेश जमीन पर नहीं उतर पाया है। जबकि हकीकत यह है कि पंकज चौधरी जिस ब्राह्मण समाज के समर्थन से सात बार सांसद बने, उसी समाज में उनके खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। राजनीतिक विरोधी दल, जिनका अतीत ब्राह्मण विरोधी बयानों से भरा रहा है, वही अब ब्राह्मण सम्मान का दावा करते नजर आ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा जल्द ही इस मुद्दे पर डैमेज कंट्रोल कर लेगी, लेकिन पंकज चौधरी को संगठनात्मक तौर पर भारी मेहनत करनी होगी। ब्राह्मण पदाधिकारियों की न सिर्फ संख्या बढ़ानी पड़ेगी, बल्कि उन्हें प्रभावशाली जिम्मेदारियां भी देनी होंगी। साथ ही, वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं से नियमित विमर्श कर आगे की रणनीति तय करनी होगी।
यह प्रकरण एक सबक भी है कि संगठनात्मक राजनीति में भरोसा, संतुलन और सही सलाह सबसे बड़ी ताकत होती है। प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर पंकज चौधरी अब अथाह कार्यकर्ताओं के समुद्र में हैं, जहां जीत की कुंजी व्यक्तिगत चतुराई नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं का विश्वास होता है।

