बांग्लादेश ने रद्द किया प्रोजेक्ट इंडियन इकोनॉमिक जोन : ट्रंप के टैरिफ अटैक के बाद देश को आर्थिक मोर्चा में दूसरा झटका

नई दिल्ली।(आवाज न्यूज ब्यूरो) बांग्लादेश द्वारा इंडियन इकोनॉमिक ज़ोन प्रोजेक्ट के रद्द होने से भारत के लिए यह सिर्फ़ एक प्रोजेक्ट का नुकसान नहीं है बल्कि रणनीतिक आर्थिक और कूटनीतिक तीनों मोर्चो पर झटका माना जा रहाहै। जिस जमीन पर भारतीय पूंजी से फैक्ट्रियों की नींव पडऩी थी जहां हजारों करोड़ के निवेश और हजारों रोजगार की कहानियां गढ़ी जानी थीं उसी ज़मीन पर अब तोपों गोला बारूद और रक्षा उद्योग का बोर्ड टंग दिया गया है। और यह सब उस देश में हुआ है जिसे भारत पिछले एक दशक से सबसे भरोसेमंद पड़ोसी बताता आया है।
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में राष्ट्रीय मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस ने चटगांव मीरसराय में भारत के सहयोग से बनने जा रहे इकोनमिक जोन को बांग्लादेश आर्थिक ज़ोन प्राधिकरण बीईजेडए की एक अहम बैठक में न बनने का ऐलान कर सभी को चौका दिया है। चटगांव में बंद हुआ यह ज़ोन दरअसल भारतीय प्रभाव के सिमटने की पहली सार्वजनिक घोषणा है। और यह घोषणा बेहद शोर के साथ नहीं बल्कि नीतिगत खामोशी और रणनीतिक बेरुख़ी के साथ की गयी है जो कहीं ज़्यादा खतरनाक है।
अब डिफेंस इंडस्ट्रीयल जोन : चटगांव-मीरसराय का इंडियन इकोनामिक जोन कागज पर एक औद्योगिक परियोजना थी। लेकिन जमीन पर वह भारत की साफ्ट पावर की प्रयोगशाला। 1000 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में बनने वाले इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत लगभग 8 से 10 अरब डालर का निवेश माना जा रहा था। इस प्रोजक्ट में टेक्सटाइल, फार्मा, आटो कंपोनेंट्स आदि की कंपनियों को लगना था। बदली परिस्थितियों में ढाका ने साझेदारी नहीं संदेह को चुना।
डिफेंस इंडस्ट्रियल ज़ोन का ऐलान यह बता रहा है कि बांग्लादेश अब अपनी ज़मीन पर भारतीय पूंजी नहीं रणनीतिक हथियार चाहता है। और यह बदलाव तब हुआ जब क्षेत्र में चीन पहले से हथियार बंदरगाह और कर्ज़ के साथ मौजूद है।
आईईजेड का रद्द होना सिर्फ विदेश नीति का झटका नहीं है। इस प्रोजेक्ट के बंद होने से भारत की ग्रोथ विंडो पर असर पड़ेगा यानि कि भारतीय अर्थव्यवस्था में इस फैसले का निगेटिव इम्पैक्ट आना तय है। क्योंकि विदेशी निवेश पहले ही दबाव में चल रहा है। रुपया डालर के सामने लडख़ड़ा रहा है और सोना चांदी रिकार्ड ऊंचाई पर है। वहीं ईयू ट्रेड डील से सस्ते आयात का एक अनजाना डर भी जन्म ले चुका है और अब पड़ोस में भारतीय उद्योग के लिए दरवाज़े बंद यह सब बजट से ठीक पहले हो रहा है। जहां सरकार मेक इन इंडिया का ढोल पीटने वाली है लेकिन पड़ोसी देश मेक विदाउट इंडिया का बोर्ड टांग चुके हैं।
हर राजनीतिक कहानी में एक मोड़ आता है जहां तर्क चुप हो जाते हैं और इशारे बोलने लगते हैं। बांग्लादेश द्वारा इंडियन इकोनॉमिक ज़ोन को रद्द करने की कहानी भी वहीं पहुंच चुकी है। ऊपर से तो यह फैसला औद्योगिक नीति का लगता है। लेकिन भीतर उतरिए तो यह रिश्तों की टूटी हुई हड्डियों की आवाज़ से ज्यादा कुछ नहीं। भारत और बांग्लादेश के रिश्ते भरोसे से शुरू हुए थे। शेख़ हसीना के दौर में भारत ने ढाका को वह समर्थन दिया जो कोई पड़ोसी नहीं देता। राजनीतिक संरक्षण कूटनीतिक ढाल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बचाव। लेकिन राजनीति में हर एहसान ब्याज के साथ लौटता है और कई बार वही ब्याज रिश्ते डुबो देता है।