बिहार की भाजपा सरकार और नीतीश कुमार का रिटर्न गिफ्ट

बृजेश चतुर्वेदी

नई दिल्ली।(आवाज न्यूज ब्यूरो)। नीतीश बाबू जाते-जाते भाजपा और संघ को ऐसा ‘रिटर्न गिफ्ट’ दे गए हैं, जिसकी टीस नागपुर तक महसूस की जा रही है। अगर इस दर्द की गहराई नापनी हो, तो जरा विजय सिन्हा के चेहरे की लकीरें पढ़िए और तेजस्वी यादव की मुस्कुराहट देखिए। ​विजय सिन्हा ने अनजाने में वही सच उगल दिया जो संघ के स्वयंसेवक और भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता पिछले कई दिनों से बंद कमरों में ‘कोहनी मार-मार’ कर एक-दूसरे से कह रहे थे।

विडंबना देखिए, ​संघ अपनी स्थापना का 101वां साल मना रहा है। बिहार में पहली बार भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार का सपना साकार हुआ, लेकिन नियति का क्रूर मजाक तो देखिए: जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा है, वह न कभी शाखा गया। न उसने कभी ‘नमस्ते सदा वत्सले’ का पाठ किया। न ही वह कभी भाजपा का प्राथमिक सदस्य रहा।

​नीतीश कुमार जाते-जाते ऐसा ‘दुल्हा’ थमा गए जो बारात की विचारधारा से ही मेल नहीं खाता। ​तभी तो तेजस्वी यादव बगल में बैठकर मंद-मंद मुस्का रहे हैं। उनका तंज एकदम सटीक है, आखिर मुख्यमंत्री जी भी तो उसी ‘समाजवादी पाठशाला’ के ग्रेजुएट हैं जिसके हेडमास्टर लालू प्रसाद यादव हैं। संघ और भाजपा के ‘चाणक्य’ देखते रह गए और बाजी वह मार ले गया जिसने कभी भगवा झंडा उठाने की ट्रेनिंग ही नहीं ली।

​हैरानी की बात तो ये है कि यह सारा ‘खेला’ बी.एल. संतोष जैसे कड़क संगठन मंत्री और शिवराज सिंह चौहान जैसे दिग्गजों की मौजूदगी में हुआ। अनुशासन की बात करने वाली पार्टी आज एक ऐसे नेतृत्व को ढोने पर मजबूर है, जिसकी जड़ें कहीं और हैं।

नीतीश कुमार ने साबित कर दिया कि वह राजनीति के वो ‘इंजीनियर’ हैं जो पुल भले ही कच्चा बनाएँ, लेकिन विरोधियों के अरमानों पर पानी फेरने वाला बांध एकदम पक्का बनाते हैं। भाजपाइयों के लिए स्थिति अब वैसी ही है “दिल के अरमां आंसुओं में बह गए, हम गली में थे और वो मुख्यमंत्री बन गए।