प्रयागरात। (आवाज न्यूज ब्यूरो)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रेप केस में एक आरोपी की अग्रिम याचिका पर मंगलवार (28 फरवरी) को सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट ने एक बड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि बालिगों के बीच सहमति से लंबे समय तक चलने वाला शारीरिक संबंध बलात्कार नहीं हो सकता है। कोर्ट ने इस केस में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका मंजूर करते हुए यह आदेश दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की सिंगल बेंच ने आरोपी को सशर्त अग्रिम जमानत देते हुए कहा कि वो पुलिस जांच में सहयोग करेगा। इस मामले पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं, जिसके बाद कोर्ट ने यह टिप्पणी की।
हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत देने की मांग
जानकारी के मुताबिक आरोपी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा तब खटखटाया जब मामले में कथित पीड़िता ने उसके खिलाफ बीएनएस की अलग-अलग धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कराई। आरोपी याचिकाकर्ता ने आजमगढ़ के सिधारी थाने में बीएनएस की धारा 64, 115(2) और 351(3) के तहत एफआईआर दर्ज होने के बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल करते हुए कोर्ट से अग्रिम जमानत देने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान याची के वकील ने कोर्ट ने दलील देते हुए कहा कि याची को बलात्कार केस में फर्जी तरीके से फंसाया गया है। उन्होंने कोर्ट में अपनी सारी दलीलें रखीं। कोर्ट ने सभी तथ्यों के आधार पर माना कि सहमति से बालिगों के बीच लंबे समय से चले आ रहे फिजिकल रिलेशन को बलात्कार नहीं माना जा सकता है। पीड़ित जो एक विधवा है और उसका 15 साल का बेटा है उसने बीएनएस की धारा 173(4) के तहत एक अर्जी के आधार पर याची के खिलाफ झूठी रिपोर्ट दर्ज कराई है। बीएनएस की धारा 183 के तहत दर्ज किया गया बयान एफआईआर में बताई गई कहानी से बिल्कुल अलग है। धारा 183 के तहत दर्ज बयान में आपसी सहमति से संबंध दिखाया गया है और याचिकाकर्ता के खिलाफ बीएनएस की धारा 64(1) के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। वहीं याची का कोई क्रिमिनल इतिहास नहीं है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि मामले में महिला ने दावा किया कि उसने 2022 से याचिकाकर्ता से बात करना शुरू किया था। हालांकि कोर्ट में सरकार की तरफ से अग्रिम जमानत याचिका का विरोध किया गया। कहा गया कि याची इस मामले में अकेला नामजद आरोपी है। उसने पीड़िता का फायदा उठाते हुए बंदूक की नोक पर उसके साथ रेप किया।
सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि एफआईआर में यह नहीं बताया गया कि पीड़िता और याचिकाकर्ता के बीच सहमति से रिश्ता था। बीएनएस की धारा 183 के तहत दर्ज बयान में पीड़िता का दावा है कि उसने साल 2022 से याची से फोन पर बात करना शुरू कर दिया था और उसके साथ शारीरिक संबंध भी बनाए थे। वह लगभग 35 साल की विधवा है जिसका एक 15 साल का बेटा है। सभी तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि सहमति से बालिगों के बीच लंबे समय से चले आ रहे फिजिकल रिलेशन को रेप नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जहां तक इस घटना का सवाल है जिसमें याची के बारे में कहा गया है कि उसने बंदूक की नोक पर पीड़िता के साथ रेप किया। कोर्ट की राय में यह बीएनएस की धारा 183के तहत दर्ज बयान में बताई गई कहानी से मेल नहीं खाती।
कोर्ट ने माना कि बीएनएस की धारा 183 के तहत दर्ज बयान में याची और पीड़िता के प्रेम संबंध का पता चलता है। मेडिकल जांच के दौरान भी डॉक्टर को दिए गए बयान में पीड़िता और याचिकाकर्ता के 2024 से रिश्ते में होने की बात कही गई है। याची की पत्नी ने भी पीड़िता को फ़ोन करके बताया कि याची के कई रिश्ते रहे है जिसके बाद उसने याची से संपर्क बंद कर दिया और उसके बाद अक्टूबर 2025 को याची ने पीड़िता के साथ रेप किया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बीएनएस की धारा 173(4) के तहत एक आवेदन के आधार पर दर्ज की गई एफआईआर में इन डिटेल्स का न होना कोर्ट की राय में प्रथम दृष्टया पूरी प्रॉसिक्यूशन कहानी पर शक पैदा करता है। याची का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। कोर्ट ने मामले के सभी तथ्यों और हालात को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता की अग्रिम जमानत अर्जी मंजूर कर ली।