पुलिस की कार्यशैली पर हाईकोर्ट की सख्ती पर बोले अखिलेश : कलयुग में कानून के रखवाले ही बन रहे अपराधी

प्रयागराज।(आवाज न्यूज़ ब्यूरो )।  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में पुलिस अधिकारियों की निष्ठा संविधान की अपेक्षा सत्ता में रहने वाली सरकारों के प्रति अधिक दिखाई देती है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कहा कि प्रदेश में राजनेताओं और नौकरशाहों की सामंती मानसिकता ने लंबे समय से संवैधानिक शासन को जनसेवा के बजाय व्यक्तिगत प्रभुत्व का माध्यम बना दिया है। इस बयान को लेकर सियासत तेज हो गई है। इसे लेकर अखिलेश योगी सरकार पर हमला बोला है।
भाजपा सरकार को शासन करने का कोई अधिकार नहीं
उन्होंने एक्स पर पोस्टकर कहा कि माननीय इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भाजपा सरकार के समय में हो रही पुलिसिया ज़्यादतियों को देखकर, उप्र की पुलिस व्यवस्था पर जो सख्त टिप्पणी की है उसे सुनकर तो नैतिक रूप से भाजपा सरकार को शासन करने का कोई अधिकार नहीं बचता है परंतु नैतिकता, निष्पक्षता, सत्यनिष्ठता, ईमानदारी व इंसाफ़ जैसे शब्द भाजपा के शब्दकोश में हैं ही नहीं।
संविधान सदैव रहेगा, ये भाजपाई तो अंतिम दौर में हैं
भाजपा राज में पुलिस भाजपा के भ्रष्टाचार की ‘भ्रष्टपुतली’ बनकर, संविधान के स्थान पर अवैधानिक-आपराधिक तरीक़े अपनाकर सत्ता के सियासी फ़ायदे के लिए क़ानून अपने हाथ में ले रही है। उन्होंने नसीहत देते हुए लिखा भ्रष्ट पुलिसवाले दो बातें याद रखें ये भाजपा किसी की सगी नहीं हैं। संविधान सदैव रहेगा, ये भाजपाई तो अंतिम दौर में हैं। भाजपाई निश्चित रूप से जा रहे हैं और फिर कभी लौटकर आएंगे भी नहीं। न्याय कहे आज का, नहीं चाहिए भाजपा!
स्वतंत्र रुख अपनाने वाले अधिकारियों को दिए जाते हैं महत्वहीन पद
दरअसल, अदालत ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा, राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था विभिन्न सरकारों के दौरान गहरे राजनीतिक हस्तक्षेप के प्रति संवेदनशील रही है। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश में अधिकारियों के तबादले, नियुक्तियां और पदोन्नतियां योग्यता आधारित प्रशासन के बजाय राजनीतिक संरक्षण के साधन बन गए हैं। तीन जून को दिए गए अपने फैसले में पीठ ने कहा, सत्ताधारी व्यवस्था के प्रति निष्ठावान माने जाने वाले अधिकारियों को पसंदीदा पदस्थापनाएं(पोस्टिंग)-जैसे शहरी कमिश्नरेट और महत्वपूर्ण जिले प्राप्त होते हैं, जबकि स्वतंत्र रुख अपनाने वाले अधिकारियों को दंडात्मक रूप से महत्वहीन पदों पर भेज दिया जाता है। यह एक सर्वविदित तथ्य है।
मुठभेड़ों में हुई मौतें, चुनिंदा कार्रवाई
अदालत ने कहा, अधिकारियों की निष्ठा संविधान के प्रति नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ व्यवस्था के प्रति होती है। तबादला-पदस्थापन की व्यवस्था से भली-भांति परिचित क्षेत्रीय अधिकारी अपने राजनीतिक वरिष्ठों को संतुष्ट करने के अनुरूप आचरण करते हैं। मुठभेड़ों में हुई मौतें, चुनिंदा कार्रवाई और असुविधाजनक व्यक्तियों के खिलाफ गैंगस्टर अधिनियम का लक्षित उपयोग समय-समय पर न्यायिक संज्ञान में आता रहा है।
प्राथमिकी दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों से दर्ज की जाती है
पुलिस व्यवस्था और कानून के शासन पर कड़ी टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति दिवाकर ने कहा, अधिकारी वर्ग का एक बड़ा हिस्सा विधि के शासन को संवैधानिक दायित्व के बजाय प्रशासनिक असुविधा के रूप में देखता है। विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन किए बिना गिरफ्तारियां की जाती हैं। कई बार प्राथमिकी दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों से दर्ज की जाती हैं या दबा दी जाती हैं तथा निवारक निरोध के प्रावधानों का मनमाने ढंग से उपयोग किया जाता है।
पुलिस शक्तियों के कथित दुरुपयोग पर कोर्ट ने की टिप्पणी
उन्होंने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता और अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत उपलब्ध प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की अक्सर अनदेखी की जाती है तथा न्यायालय के आदेशों का औपचारिक पालन तो किया जाता है, लेकिन उनके वास्तविक उद्देश्य को निष्प्रभावी कर दिया जाता है। न्यायमूर्ति दिवाकर ने ये टिप्पणियां गैंगस्टर एवं असामाजिक गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1986 से संबंधित राजेंद्र त्यागी द्वारा दायर एक मामले की सुनवाई के दौरान कीं। गैंगस्टर कानून के तहत आरोपित एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने राज्य में पुलिस शक्तियों के कथित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त की।