नई दिल्ली। (आवाज न्यूज ब्यूरो) । चुनाव आयोग के पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने निर्वाचन आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि चुनाव आयोग को अपने फैसलों और उनसे जुड़े विवादों पर “पूरे तथ्य” सार्वजनिक करने चाहिए और एसआईआर के तीसरे चरण को फिलहाल रोक देना चाहिए। उनका कहना है कि तीसरे चरण में कई खामियां हैं और इसकी ज़रूरत भी साफ नहीं है।
लवासा ने द टेलीग्राफ अखबार से बातचीत में कहा कि तीसरा चरण अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए आयोग को इसे आगे बढ़ाने के बजाय एसआईआर से पहले की मतदाता सूची पर वापस जाना चाहिए। उनके मुताबिक, आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसके भीतर उठाई गई आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई और अंतिम फैसले किस आधार पर लिए गए।
दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर भी जवाब दे चुनाव आयोग
लवासा की यह टिप्पणी उस रिपोर्ट के बाद आई है जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में चुनाव आयोग के कई फैसलों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। लवासा ने कहा कि इन आपत्तियों को लेकर यह साफ होना जरूरी है कि वे सिर्फ सामान्य प्रशासनिक टिप्पणियां थीं या वास्तविक असहमति।
उन्होंने सवाल उठाया कि-
इन पत्रों और आपत्तियों का क्या हुआ?
क्या इन्हें आयोग ने औपचारिक रूप से जांचा?
इन पर क्या चर्चा हुई?
अंतिम निर्णय क्या लिया गया?
अगर कोई फैसला कानून के खिलाफ था तो उसकी जवाबदेही किसकी तय हुई?
उन्होंने कहा कि यदि दो चुनाव आयुक्तों का एक मत था और मुख्य चुनाव आयुक्त ने उसके विपरीत फैसला किया, तो यह समझना महत्वपूर्ण है कि एक व्यक्ति का मत बाकी दो के मत पर कैसे प्रभावी हुआ। हालांकि चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों के जवाब में कहा है कि चुनाव आयुक्तों के बीच अलग-अलग विचार होना निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है और पिछले एक साल में लिए गए सभी फैसले पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत फैसले थे।
बंगाल में 16 लाख मतदाताओं को जोड़ने के खिलाफ अपील का रहस्य
लवासा ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान करीब 16 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के खिलाफ दायर अपीलों को भी एक महत्वपूर्ण सवाल बताया। उन्होंने कहा कि किसी एक राज्य में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम शामिल किए जाने के खिलाफ अपील सामने आई है। उनका सवाल है कि इन अपीलों को किसने दायर किया और उनके पीछे क्या आधार था?
16 सितंबर को राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओश्ब्रायन को भेजे जवाब में चुनाव आयोग ने बताया था कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर से संबंधित कुल 38,31,249 अपीलें दायर हुईं। इनमें लगभग 22 लाख अपीलें उन मतदाताओं की थीं जिनके नाम हटाए गए या बाहर रह गए थे, जबकि 16 लाख से कुछ अधिक अपीलें मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के खिलाफ थीं। लेकिन आयोग ने अभी तक यह सार्वजनिक नहीं किया है कि नाम शामिल किए जाने के खिलाफ ये अपीलें किसने दायर की थीं।
बंगाल में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ भी विवाद का मुद्दा
पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ नाम की एक श्रेणी बनाई गई थी। इस श्रेणी में करीब 60 लाख मतदाताओं को चिह्नित किया गया, जिनमें लगभग 27 लाख नाम बाद में हटाए गए। यही वजह है कि बंगाल में एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हुआ। लवासा के मुताबिक, चुनाव आयोग को इस पूरी प्रक्रिया और उसके आधार को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए।
फार्म 6 में बदलाव पर भी सवाल
लवासा ने फार्म 6 में किए गए बदलाव पर भी सवाल उठाया। फार्म 6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए किया जाता है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त संधू और विवेक जोशी ने फार्म 6 में किए गए बदलावों पर आपत्ति जताई थी। लवासा ने कहा कि चुनाव आयोग अपने स्तर पर नियमों में बदलाव नहीं कर सकता, इसके लिए संबंधित सरकारी प्राधिकरण की अनुमति आवश्यक है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 326 का हवाला देते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति मतदान के लिए पात्र है, तो उसके माता-पिता या दादा-दादी पहले मतदाता रहे थे या नहीं, इससे उसके वोट देने के अधिकार का निर्धारण नहीं किया जा सकता। चुनाव आयोग का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने फार्म 6 से जुड़े प्रावधान को बरकरार रखा था। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों ने इस पर अंतर किया है। उनके मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने बिहार एसआईआर के दौरान फार्म 6 के साथ जुड़े घोषणा-पत्र को स्वीकार किया था, लेकिन जुलाई में ऑनलाइन फार्म 6 में किए गए उस बदलाव पर फैसला नहीं दिया था जिसमें पिछले एसआईबार से माता-पिता की जानकारी दर्ज करना अनिवार्य किया गया।
मतदाता की पात्रता तय करने का अधिकार किसके पासः
लवासा ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मतदाता की पात्रता तय करने की जिम्मेदारी ईआरओ की है। उन्होंने कहा कि ईआरओ ही यह तय करता है कि कोई व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल होने के योग्य है या नहीं। इसके खिलाफ अपील का अधिकार जिला निर्वाचन अधिकारी या राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास होता है। लवासा के मुताबिक चुनाव आयोग की भूमिका मतदाता सूची तैयार करने की निगरानी तक है। वह खुद प्रत्येक मतदाता की पात्रता निर्धारित करने वाला प्राथमिक अधिकारी नहीं है।
गोवा का उदाहरण भी उठाया
लवासा ने गोवा में सामने आए एक मामले को भी गंभीर बताया। उनके मुताबिक, ईआरओ ने 97 मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल करने के योग्य पाया था, लेकिन फरवरी से इन नामों को सूची में शामिल नहीं किया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों ने इन मतदाताओं को पात्र पाया था, तो उन्हें मतदाता सूची में शामिल करने में इतना समय क्यों लगा।
यह मामला एसआईआर के दौरान इस्तेमाल किए जा रहे ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर और मतदाता सूची में नाम जोड़ने या बहाल करने की प्रक्रिया को लेकर उठे व्यापक सवालों से भी जुड़ता है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया था कि गोवा में ईआरओ द्वारा वैध पाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने के अनुरोधों पर कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने कहा कि गोवा के 97 मतदाताओं के नाम फिर से जोड़े जा रहे हैं।
तीसरे चरण को रोकने की मांग क्यों?
लवासा का कहना है कि जब एसआईआर के दूसरे चरण और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में प्रक्रिया को लेकर इतने सवाल खड़े हो चुके हैं, तब तीसरे चरण को उसी तरह आगे बढ़ाना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि पहले पूरे तथ्य सामने आने चाहिए, विवादित प्रक्रियाओं की समीक्षा होनी चाहिए और उसके बाद ही आगे की कार्रवाई पर निर्णय होना चाहिए। चुनाव आयोग ने मई 2026 में एसआईआर के तीसरे चरण को 16 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में लागू करने का कार्यक्रम घोषित किया था। इसके तहत करीब 36.73 करोड़ मतदाताओं को कवर किया जाना था और 3.94 लाख से अधिक बूथ लेवल अधिकारियों को घर-घर जाकर प्रक्रिया पूरी करनी थी।
विवाद के बीच चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर बहस
एसआईआर को लेकर अब विवाद केवल मतदाता सूची में नाम जुड़ने या हटने तक सीमित नहीं है। बहस का एक बड़ा हिस्सा चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद, फार्म 6 में बदलाव, ईसीआईनेट की भूमिका और स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों के अधिकार को लेकर है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने भी हाल में कहा था कि मौजूदा चुनाव आयुक्तों को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि एसआईआर से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों पर उनके बीच वास्तव में क्या चर्चा हुई थी। उन्होंने कहा था कि चुनाव आयोग में आम तौर पर फैसले सर्वसम्मति से होते थे। ऐसे में अशोक लवासा की मांग का मुख्य बिंदु यही है कि चुनाव आयोग को विवादों पर चयनित बयान या प्रशासनिक भाषा के बजाय पूरी प्रक्रिया और तथ्य जनता के सामने रखने चाहिए, ताकि मतदाता समझ सकें कि एसआईआर से जुड़े फैसले किस आधार पर लिए गए और किस स्तर पर कौन-सी जिम्मेदारी तय हुई।
अशोक लवासा ने चुनाव आयोग से कहा: एसआईआर के तीसरे चरण को रद्द करें, पुरानी वोटर लिस्ट पर लौटें
