नई दिल्ली। (आवाज न्यूज ब्यूरो) । पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। द वायर की एक खोजी रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय निर्वाचन आयोग के सॉफ्टवेयर से राज्य की अंतिम मतदाता सूची से 5,38,320 मतदाताओं के नाम ऐसे फॉर्म के आधार पर हटाए गए, जिन्हें किसी व्यक्ति ने दाखिल नहीं किया था। रिपोर्ट का दावा है कि इन नामों को हटाने के लिए तैयार किए गए फॉर्म में कोई स्पष्ट कारण दर्ज नहीं था।
इस मामले ने मतदाता सूची की पारदर्शिता, चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर की जवाबदेही और मताधिकार से जुड़े नागरिकों के अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी हटाए गए मतदाता पात्र थे या उनके नाम गलत तरीके से काटे गए। मुख्य सवाल यह है कि जब किसी मतदाता का नाम हटाया गया, तो उसके पीछे का कारण आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज क्यों नहीं था।
क्या है पूरा मामला: एसआईआर में सॉफ्टवेयर से कैसे कटे वोटरों के नाम
द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में ऐसे फॉर्म इस्तेमाल हुए, जिन्हें निर्वाचन आयोग के सॉफ्टवेयर ने खुद तैयार किया था। इन फॉर्मों में नाम हटाने का कोई स्पष्ट कारण दर्ज नहीं था। पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के 6 मार्च 2026 के बयान के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची में फॉर्म-7 के तहत कुल 5,38,320 नाम हटाए जाने के आंकड़े में ऐसे ऑटो-जेनरेटेड फॉर्म भी शामिल थे, जो मतदाताओं के एन्यूमरेशन फॉर्म खारिज होने के बाद तैयार हुए थे।
यह प्रक्रिया 14 दिसंबर 2025 को प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची और 28 फरवरी 2026 को प्रकाशित अंतिम सूची के बीच हुई थी। मामले की गंभीरता इस तथ्य से समझी जा सकती है कि निर्वाचन अधिकारी के पास सुनवाई के बाद किसी मतदाता की पात्रता स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार था। रिपोर्ट के अनुसार, जब किसी मतदाता का फॉर्म अस्वीकार किया गया, तो सॉफ्टवेयर ने उसी अधिकारी के नाम से फॉर्म-7 तैयार कर दिया। इस तरह अधिकारी ही आपत्ति दर्ज करने वाला और उसी मामले का फैसला करने वाला बन गया।
फॉर्म-6 और फॉर्म-7 में क्या अंतर है?
फॉर्म-6: मतदाता सूची में नया नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल होता है।
फॉर्म-7: किसी मतदाता के नाम को हटाने पर आपत्ति दर्ज करने या नाम हटाने का अनुरोध करने के लिए इस्तेमाल होता है।
फॉर्म-10 रजिस्टर: इसमें हटाए गए नाम, आपत्ति दर्ज करने वाले व्यक्ति और नाम हटाने के आधार का रिकॉर्ड रखा जाता है।
फॉर्म-7 के तहत किसी मतदाता का नाम हटाने के लिए निर्धारित आधारों में मृत्यु, निर्धारित आयु से कम होना, अनुपस्थित होना, दूसरे स्थान पर चले जाना, एक से अधिक स्थानों पर पंजीकरण और भारतीय नागरिक नहीं होना शामिल हैं। द वायर के अनुसार, सुनवाई में पात्रता साबित नहीं कर पाने को अपने आप में फॉर्म-7 में नाम हटाने का स्पष्ट वैधानिक आधार नहीं बताया गया है। इसी वजह से सॉफ्टवेयर से तैयार किए गए फॉर्मों की वैधता और पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
99.9 फीसदी मामलों में आपत्ति दर्ज करने वाला अधिकारी ही था
द वायर ने पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों में से 284 सीटों के फॉर्म-10 रजिस्टरों की जांच की। इनमें 5,24,420 ऐसी प्रविष्टियां थीं, जिन्हें रिपोर्टर सत्यापित कर सके। इनमें से 5,23,998 मामलों में, यानी लगभग 99.9 फीसदी मामलों में, आपत्ति दर्ज करने वाले व्यक्ति के रूप में निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी का नाम था। हर मामले में कारण वाला कॉलम खाली था। केवल 422 मामलों में किसी व्यक्ति का नाम आपत्ति दर्ज करने वाले के रूप में मौजूद था। रिपोर्ट के मुताबिक, जिन दस सीटों के रजिस्टर उपलब्ध नहीं हो सके, उनमें कूचबिहार की आठ और अलीपुरद्वार की दो सीटें शामिल थीं। इन सीटों पर फॉर्म-7 के तहत 14,061 नाम हटाए गए थे। इसलिए राज्य में ऐसे सभी मामलों की वास्तविक संख्या की पूरी तस्वीर उपलब्ध रिकॉर्ड से नहीं मिल सकी। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी हटाए गए नाम गलत तरीके से काटे गए। लेकिन जब रिकॉर्ड में हटाने का कारण ही नहीं है, तो प्रभावित मतदाता के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि उसका नाम क्यों हटाया गया और वह फैसले को किस आधार पर चुनौती दे।
किन जिलों और विधानसभा क्षेत्रों पर सबसे अधिक असर पड़ा?
द वायर के विश्लेषण के अनुसार, उत्तर 24 परगना और नदिया जिलों में फॉर्म-7 के तहत हुए नामों के विलोपन का लगभग 39 फीसदी हिस्सा दर्ज किया गया। उत्तर 24 परगना में ड्राफ्ट मतदाता सूची के मुकाबले ऐसे विलोपन की दर 1.88 फीसदी थी, जबकि मुर्शिदाबाद में यह 0.27 फीसदी रही। रिपोर्ट में जिन विधानसभा क्षेत्रों में सबसे अधिक ऐसे मामले सामने आए, उनमें शामिल हैं- डाबग्राम-फुलबाड़ी और बागदा।
इसके अलावा बनगांव उत्तर, बनगांव दक्षिण, गायघाटा, कल्याणी, शांतिपुर और रानाघाट क्षेत्र की सीटों का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, डाबग्राम-फुलबाड़ी में सबसे ज्यादा 16,491 और बागदा में 15,285 नाम इस श्रेणी में हटाए गए। इनमें से कई सीटें मतुआ समुदाय और शरणार्थी आबादी वाले इलाकों में आती हैं। इन क्षेत्रों में पुराने मतदाता रिकॉर्ड से मिलान नहीं हो पाने वाले मतदाताओं का अनुपात राज्य के औसत से अधिक था। राज्य स्तर पर ड्राफ्ट सूची के 4.3 फीसदी मतदाता इस श्रेणी में थे, जबकि प्रभावित सीटों पर यह अनुपात 8.5 से 14.5 फीसदी के बीच था।
उत्तर प्रदेश में भी सामने आया था ऐसा ही मामला
पश्चिम बंगाल का मामला अकेला नहीं है। द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में भी एरोनेट सॉफ्टवेयर द्वारा स्वतः फॉर्म-7 तैयार किए जाने की प्रक्रिया सामने आई थी। द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने 9 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश में 85,854 ऐसे फॉर्म तैयार होने की खबर दी थी, जिनके जरिये मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया में कारण दर्ज नहीं किए गए थे। उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इस रिपोर्ट का खंडन करते हुए बयान जारी किया, लेकिन उनके स्पष्टीकरण में भी सॉफ्टवेयर से स्वतः फॉर्म तैयार होने की प्रक्रिया की पुष्टि हुई थी। द वायर का दावा है कि पश्चिम बंगाल में इस तरह के बिना कारण वाले विलोपन की संख्या, राज्य की ड्राफ्ट मतदाता सूची के आकार को ध्यान में रखते हुए, उत्तर प्रदेश की तुलना में कहीं अधिक थी।
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