संकीर्ण जीवन-दृष्टि और टूटती नैतिक रीढ़
“जब जीवन का अर्थ सिर्फ संपत्ति रह जाए” “अच्छे जीवन की भूलभुलैया: क्या खोया, क्या पाया?” नई दिल्ली।(आवाज न्यूज ब्यूरो)। आधुनिक समाज में “अच्छे जीवन” की जो धारणा प्रचलित है, वह दिन-ब-दिन और भी अधिक संकीर्ण, आत्मकेन्द्रित और भौतिकतावादी होती जा रही है। जीवन के उद्देश्य को अब केवल आर्थिक सफलता, सामाजिक प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत…
