लखनऊ।( आवाज न्यूज़ ब्यूरो ) विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने रक्षाबंधन के अवसर पर भी निजीकरण के खिलाफ जनसंपर्क अभियान जारी रखा है। समिति के पदाधिकारियों ने आवासीय कॉलोनी में जाकर लोगों को निजीकरण से होने वाले संभावित नुकसानों के बारे में जानकारी दी। इसके साथ ही समिति ने पावर कार्पोरेशन प्रबंधन से निजीकरण को लेकर पांच महत्वपूर्ण सवाल पूछे हैं?
पावर कार्पोरेशन प्रबंधन से पांच सवाल? :बिजली निजीकरण के विरोध में 255 दिन से आंदोलन जारी है। संघर्ष समिति ने एक ऑनलाइन बैठक में अपने आंदोलन की समीक्षा बैठक की है। सभी पदाधिकारी ने संकल्प लिया कि निजीकरण के विरोध में पिछले 255 दिनों से चल रहा उनका आंदोलन जारी रहेगा। जब तक निजीकरण का फैसला पूरी तरह वापस नहीं लिया जाता। संघर्ष समिति ने प्रबंधन से पूछे गए सवालों को सार्वजनिक करते हुए कहा कि यह सवाल जनता के सरोकारों से जुड़े हैं।
सब्सिडी को घाटा बताना :
पावर कारपोरेशन का कहना है कि घाटे के कारण निजीकरण किया जा रहा है। सरकार को सब्सिडी एवं लास्ट फंड देना पड़ रहा है, जिसका बोझ वह नहीं उठा सकती है। इसे गंभीर मामला बताते हुए समिति ने सवाल किया कि भाजपा के 217 के संकल्प पत्र में गरीबी रेखा से नीचे वालों को तीन प्रति यूनिट बिजली देने का वादा किया गया था, जिसकी सब्सिडी देना सरकार की बाध्यता है।
संविदा कर्मियों की छंटनीः
प्रदेश में कारपोरेट घराने को फायदा पहुंचाने के लिए निजीकरण से पहले ही लगभग 45 प्रतिशत संविदा कर्मियों को हटा दिया गया है। समिति ने आरोप लगाया कि अनुभवी संविदा कर्मियों को हटाने से बिजली आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिसका जिक्र ऊर्जा मंत्री को भी करना पड़ा। सवाल है क्या प्रबंधन बिजली व्यवस्था बिगाड़ कर जनता पर निजीकरण थोपना चाहता है।
निजीकरण से सुधार की गारंटीः
51 फीसदी हिस्सेदारी बेंचकर निजीकरण करने से क्या सुधार की गारंटी? समिति ने उड़ीसा का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां 1999 में बिजली का निजीकरण असफल रहा था। 2015 में रिलायंस के लाइसेंस रद्द कर दिए गए थे। उड़ीसा विद्युत नियामक आयोग ने टाटा पावर को खराब प्रदर्शन के चलते नोटिस जारी किया है। समिति ने पूछा कि क्या उत्तर प्रदेश को भी उड़ीसा जैसे हालात में नहीं धकेला जा रहा है?
ऊर्जा मंत्री के दावों पर सवालः
ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने ट्वीट कर कहा है कि 2017 में 41 फीसदी की एंटी एंड सी हानियां घटकर 2024 में 16.5 फीसदी रह गई हैं, जो एक बड़ा सुधार है। संघर्ष समिति ने सवाल किया कि यदि इतने बड़े सुधार का दावा किया जा रहा है तो फिर किसी अन्य सुधार के लिए उत्तर प्रदेश के 42 जनपदों का निजीकरण क्यों किया जा रहा है?
परिसंपत्तियों का मूल्यांकनः
पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम की पर संपत्तियों का मूल्यांकन निजीकरणों को बेचने से पहले किया गया है। यदि हां तो संघर्ष समिति ने सार्वजनिक करने की मांग की है क्योंकि यह जनता की संपत्तियां हैं।
बिजली निजीकरण के विरोध में कर्मचारी घर-घर दे रहे दस्तक : संयुक्त संघर्ष समिति ने सरकार से पूछे पांच सवाल?

