बृजेश चतुर्वेदी
लखनऊ।(आवाज न्यूज ब्यूरो)। बिहार विधानसभा चुनाव-2025 को लेकर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने ऐसा ऐलान किया है, जिसने दोनों बड़े गठबंधनों की रणनीति हिला दी है। मायावती ने साफ कर दिया कि बसपा न तो एनडीए के साथ जाएगी और न ही इंडिया गठबंधन में शामिल होगी। पार्टी सभी 243 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि बिहार की राजनीति गठबंधन और जातीय समीकरणों पर आधारित मानी जाती है। ऐसे में बसपा का अकेले उतरना कई समीकरण बदल सकता है। बसपा की ताकत यूपी में रही है, जहां मायावती चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। बिहार में अब तक बसपा सीट नहीं जीत पाई है, लेकिन कई क्षेत्रों में उसे 10-15 हजार वोट मिले हैं। 2010 में उसे 3% वोट मिले थे, जो 2020 में घटकर 0.38% रह गए। यही वजह है कि पार्टी के सामने वोट को सीट में बदलना बड़ी चुनौती है।
नई रणनीति: आकाश आनंद की जिम्मेदारी
मायावती ने इस बार बिहार को तीन जोन में बांटकर संगठन मजबूत करने का फैसला किया है। उन्होंने अपने भतीजे और राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद को बिहार की कमान सौंपी है। आकाश सितंबर से ‘अधिकार यात्रा’ शुरू करेंगे, जिसके जरिए दलित, अति पिछड़े
ईबीसी और पसमांदा मुस्लिम समुदाय को जोड़ने की कोशिश होगी।
बिहार की आबादी में दलित करीब 16%, अति पिछड़े 20% और मुसलमान लगभग 17% हैं। बसपा का मानना है कि इन वर्गों को एक मंच पर लाकर वह तीसरा विकल्प बन सकती है।
नया समीकरण और संभावनाएं
राजद यादव-मुस्लिम समीकरण पर, जदयू अति पिछड़ों पर और भाजपा ऊपरी जातियों व शहरी मतदाताओं पर टिके हैं। ऐसे में बसपा का दांव है कि वह दलित + EBC + पसमांदा मुस्लिम गठजोड़ बनाकर अपनी जमीन तैयार करे। विश्लेषकों का मानना है कि अगर बसपा 2-3% वोट भी हासिल करती है तो कई सीटों पर नतीजे प्रभावित हो सकते हैं। बिहार में अक्सर 2-3 हजार वोट का अंतर ही जीत-हार तय करता है। यही वजह है कि इंडिया गठबंधन में बेचैनी है, क्योंकि वोट बंटने का सीधा फायदा भाजपा-एनडीए को मिल सकता है। मायावती का यह ऐलान केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है। वह दिखाना चाहती हैं कि बसपा अब गठबंधनों पर निर्भर नहीं रहेगी और बाबा साहेब अंबेडकर व कांशीराम के मिशन पर चलते हुए स्वतंत्र पहचान बनाएगी।

