मुरली मनोहर जोशी ने ही फाड़ दिया विश्वगुरु का डंका

बृजेश चतुर्वेदी

लखनऊ।(आवाज न्यूज ब्यूरो)। बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने एक ऐसा बयान दिया है जो चर्चा का विषय बना हुआ है. संस्कृत भारती के कार्यालय के उद्घाटन में मुरली मनोहर जोशी से सवाल किया गया कि देश विश्वगरु है, एआई को लेकर भी बड़ा हव बन चुका है तो भाषा को लेकर क्या भूमिका है. भारत आज एक ‘विश्वगुरु’ है के सवाल पर उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि ‘विश्व गुरु’ शब्द हमें नहीं बोलना चाहिए।  हम विश्व गुरु नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि ‘विश्व गुरु’ हम कभी थे। उन्होंने आगे कहा कि ‘विश्व गुरु’ होना चाहिए। मगर आज हम विश्व गुरु हैं ऐसा नहीं है लेकिन संस्कृत उस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी नासा के लोग बार-बार कहते हैं कि संस्कृत संप्रेषण की सबसे महत्वपूर्ण भाषा है।

पूर्व मंत्री ने कहा कि मैं यह समझता हूं कि भारत की अभूतपूर्व देन होगी अगर हम संस्कृत को विश्व संप्रेषण की भाषा जल्द से जल्दी बनाया जाए क्योंकि इसी भाषा में वो शक्ति है जो बहुत बड़े ज्ञान के समुंद्र को एक सीपी में बंद कर सकती है।

देश के युवाओं को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि वह संस्कृत सीखें. संस्कृत में भाषण करना सीखें, लिखना सीखें और संस्कृत साहित्य को पढ़ें और संस्कृत में जो ज्ञान है जो पढ़ें। उन्होंने आगे कहा कि दुनिया के सभी महत्वपूर्ण लोगों ने इस बात को कहा है।

मुरली मनोहर जोशी ने संस्कृत पर बात करते हुए कहा कि परमाणु बम का विस्फोट करने वाले वैज्ञानिक ओपन हाइमर ने जब विस्फोट को देखा तो उसके मुंह से सबसे पहले गीता का वह श्लोक निकला जिसमें भगवान कृष्ण के विराट रूप का दर्शन हो।  उसने यह कहा कि विस्फोट देखकर मुझे विराट रूप का दर्शन हो गया।

पूर्व मंत्री ने आगे कहा कि इसलिए संस्कृत को बहुत सारे विद्वानों और वैज्ञानिकों ने पढ़ा है। उसके ज्ञान और सामर्थ्य को भी देखा है. मैं ऐसा समझता हूं कि भारतवासी जितनी अधिक मात्रा में और जितनी जल्दी से जल्दी संस्कृत के ज्ञान का धारण करें और उसको अपने जीवन में लाए। इससे भारत का उद्धार होगा। विश्व के लिए भी यह बहुत महत्वपूर्ण योगदान है।

सभी राज्यों में संस्कृत को अनिवार्य करने के सवाल पर उन्होंने कहा कि मैंने एक बैठक में कहा था कि संस्कृत अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाई जानी चाहिए, लेकिन वह राज्यों ने स्वीकार नहीं किया  मगर उत्तराखंड ने संस्कृत को राजकीय भाषा बनाया लेकिन संस्कृत के लिए वहां भी कोई काम नहीं हुआ।