नई दिल्ली।(आवाज न्यूज ब्यूरो) । मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग के भीतर मतभेद अब सार्वजनिक रूप से सामने आने लगे हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की एक विशेष रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फार्म 6 में किए गए बदलाव पर गंभीर आपत्ति दर्ज की थी। दोनों का कहना था कि इस वैधानिक फॉर्म में नियमों में संशोधन किए बिना बदलाव नहीं किया जा सकता। उन्होंने कई बार आपत्तियां दर्ज कराईं।
फार्म 6 में क्या आपत्तिजनक बदलाव किया गया?
फार्म 6 वह वैधानिक फॉर्म है जिसका इस्तेमाल 18 वर्ष की उम्र पूरी करने वाले नए मतदाताओं, नए भारतीय नागरिकों तथा ऐसे मतदाताओं द्वारा किया जाता है जिनका नाम मतदाता सूची से हट गया हो और वे दोबारा पंजीकरण कराना चाहते हों।
ईसीआई पोर्टल पर फार्म 6 के ऑनलाइन संस्करण में एक नया डिक्लेरेशन सेक्शन जोड़ा गया। इसमें आवेदक से पूछा गया कि-
क्या उसका नाम पिछली एसआईआर के दौरान तैयार मतदाता सूची में था?
क्या उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस सूची में था?
या न तो उसका और न ही उसके माता-पिता का नाम पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में था?
यदि आवेदक पहले दो विकल्पों में से किसी एक को चुनता था तो उसे विधानसभा क्षेत्र, बूथ नंबर और मतदाता सूची में संबंधित क्रम संख्या जैसी जानकारी देनी होती थी। दिलचस्प बात यह थी कि इस हिस्से को तकनीकी रूप से अनिवार्य नहीं बताया गया था, लेकिन आवेदक इस सवाल का जवाब दिए बिना फॉर्म जमा करने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ा सकता था।
दो चुनाव आयुक्तों ने मई में ही जताई थी आपत्ति
रिपोर्ट के अनुसार, 16 मई 2026 को चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने फाइल पर इस बदलाव को लेकर आपत्ति दर्ज की थी। उनका तर्क था कि एसआईआर के लिए इस्तेमाल किए जा रहे विशेष फॉर्म और दिशानिर्देश अलग विषय हैं, जबकि फार्म 6 और फार्म 8 वैधानिक फॉर्म हैं। ये फॉर्म रजिस्ट्रेशन आफ इलेक्टोर्स रूल्स, 1960 में निर्धारित हैं। इसलिए इनमें बदलाव करने के लिए केवल चुनाव आयोग के किसी आदेश या एसआईआर संबंधी दिशा-निर्देश का सहारा नहीं लिया जा सकता। नियमों में औपचारिक संशोधन जरूरी होगा। जोशी ने सुझाव दिया था कि फार्म 6 और फार्म 8 में प्रस्तावित बदलावों को केंद्र सरकार के पास भेजा जाए और नियमों में संशोधन की प्रक्रिया अपनाई जाए। 19 मई को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी जोशी की आपत्ति से सहमति जताई।
फिर भी पोर्टल पर बदलाव जारी रहा
इसके बावजूद जुलाई में जब द इंडियन एक्सप्रेस ने फार्म 6 में इस नए डिक्लेरेशन की मौजूदगी की रिपोर्ट की, तो यह सवाल सामने आया कि आयोग ने दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद बदलाव कैसे लागू किया। 13 अगस्त को संधू ने इस मुद्दे पर अधिकारियों को लिखे नोट में कहा कि फार्म 6 में किए गए बदलाव अनधिकृत और गैरकानूनी हैं। उन्होंने कहा कि मई में दो चुनाव आयुक्तों द्वारा स्पष्ट राय दिए जाने के बावजूद बदलाव हटाया नहीं गया और मूल फार्म 6 बहाल नहीं किया गया। संधू ने इसे तत्काल हटाने की मांग की, ताकि पात्र युवा और पहली बार मतदाता बनने वाले लोगों को मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने में परेशानी न हो।
एसआईआर का असर नए मतदाताओं पर क्यों महत्वपूर्ण है?
फार्म 6 में यह बदलाव ऐसे समय किया गया जब एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एसआईआर की प्रक्रिया में 13 करोड़ से अधिक नाम ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से हटाए जा चुके हैं। ऐसे में उन परिवारों के युवा सदस्य भी इस सवाल के दायरे में आ सकते हैं जिनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर की सूची में नहीं है। मसलन, यदि कोई 18 वर्षीय नया मतदाता ऐसे परिवार से आता है जिसके माता-पिता का नाम पिछली एसआईआर की सूची में नहीं था, तो वह पहले दो विकल्पों में से कोई विकल्प सही तरीके से नहीं चुन सकता। उसे तीसरा विकल्प चुनना पड़ता है। पोर्टल पर यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि तीसरा विकल्प चुनने के बाद उसके आवेदन पर क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
कानून में फार्म 6 बदलने की प्रक्रिया क्या है?
फार्म 6 का स्वरूप रजिस्ट्रेशन आफ इलेक्टोर्स रूल्स, 1960 में निर्धारित है। इंडियन एक्सप्रेस की जुलाई की रिपोर्ट के मुताबिक, रिप्रेजेन्टेंशन आफ द पियुपल एक्ट, 1950 की धारा 28 के तहत इन नियमों को अधिसूचित करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है, चुनाव आयोग के पास अकेले नहीं। इसका अर्थ यह है कि फार्म 6 में वैधानिक बदलाव के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। इसका एक उदाहरण 2021 के बाद देखने को मिला। संसद ने मतदाताओं से आधार नंबर लेने की अनुमति देने के लिए कानून में बदलाव किया था। इसके बाद जून 2022 में कानून मंत्रालय के लेजिस्लेटिव डिपार्टमेंट ने रजिस्ट्रेशन आफ इलेक्टोर्स रूल्स और फार्म 6 में आवश्यक संशोधन की अधिसूचना जारी की थी।
ईआरओ की भूमिका और डिजिटल सिस्टम पर सवाल
मतदाता सूची तैयार करने में ईआरओ की महत्वपूर्ण वैधानिक भूमिका होती है। सामान्यतः ईआरओ संबंधित क्षेत्र का एसडीएम होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, विवेक जोशी ने मई में मतदाता सूची के डेटाबेस के ग्रेजुएशन सेंट्रलाईजेशन पर चिंता जताई और सुझाव दिया कि यह सुनिश्चित करने के लिए ऑडिट कराया जाए कि संबंधित वैधानिक अधिकारियों के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के पास मतदाता डेटाबेस में बदलाव करने की अनुमति न हो। संधू ने अगस्त में भी राज्य स्तरीय अधिकारियों की शिकायतों का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें ईआरओनेट पर उचित और पूर्ण पहुंच नहीं मिल रही है।
क्या है पूरे विवाद का व्यापक अर्थ?
फार्म 6 विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक ऑनलाइन फॉर्म में बदलाव का मामला नहीं है। यह सवाल उठाता है कि वैधानिक मतदाता फॉर्म में बदलाव करने की शक्ति किसके पास है, आयोग के भीतर निर्णय किस प्रक्रिया से लिए जाने चाहिए और मतदाता सूची के डिजिटल प्रबंधन में केंद्रीय तथा राज्य स्तर के अधिकारियों की भूमिका क्या होनी चाहिए।
इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक, फार्म 6 में एसआईआर से जुड़ा नया सवाल जोड़ने पर दो चुनाव आयुक्तों की स्पष्ट आपत्ति के बावजूद बदलाव जारी रहा। संधू ने बाद में इसे अनाधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए तत्काल हटाने की मांग की। यह मामला अब चुनाव आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया, एसआईआर और मतदाता पंजीकरण की कानूनी व्यवस्था को लेकर व्यापक बहस का हिस्सा बन गया है।
एसआईआर फार्म 6 में ‘गैरकानूनी’ बदलाव: दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति के बाद भी ज्ञानेश अड़े रहे?
