“गोबर, गुस्सा और विश्वविद्यालय की गिरती गरिमा”

“गोबर का जवाब: जब शिक्षा की दीवारों पर गुस्सा पुता हो।”  दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों द्वारा क्लासरूम और प्रिंसिपल के घर पर गोबर लिपने की घटना केवल अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि एक गहरी असंतोष की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति थी। इस विरोध ने सत्ता और शिक्षा व्यवस्था के पाखंड को उजागर किया — जहां एक ओर गोबर को…

डिग्री नहीं, दक्षता चाहिए : नई अर्थव्यवस्था की नई ज़रूरतें

“क्लासरूम से कॉर्पोरेट तक: उच्च शिक्षा और उद्योग के बीच की दूरी” “डिग्री से दक्षता तक: शिक्षा प्रणाली को उद्योग से जोड़ने की चुनौती” “कुशल भारत की कुंजी: उद्योग अनुरूप विश्वविद्यालय शिक्षा” वर्तमान में, उच्च शिक्षा प्रणाली उद्योग की तेजी से बदलती आवश्यकताओं से मेल नहीं खाती, जिसके परिणामस्वरूप अधिकांश स्नातक रोजगार के लिए अपर्याप्त…

भीमराव अंबेडकर और आज : विचारों का आईना या प्रतीकों का प्रदर्शन?

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भारत को एक समतामूलक, न्यायप्रिय और जातिविहीन समाज का सपना दिखाया था। उन्होंने संविधान बनाया, शिक्षा और सामाजिक न्याय को हथियार बनाया, और जाति व्यवस्था का खुला विरोध किया। आज उनका नाम हर मंच पर लिया जाता है, लेकिन उनके विचारों को गंभीरता से अपनाया नहीं जाता। आरक्षण को राजनीतिक हथियार…

“जयंती का शोर, विचारों से ग़ैरहाज़िरी”

 प्रियंका सौरभ हर चौक-चौराहे पर अब, सजती है एक माला,बाबा साहब की तस्वीरें, और सस्ती सी दीवाला।नेता भाषण झाड़ रहा है, मंच सजा है भारी,पर संविधान की आत्मा है, अब भी बहुत बेचारी। टोपियाँ नीली, झंडे ऊँचे, लगती क्रांति की टोली,लेकिन सवाल ये उठता है — कहाँ है वो भूली बोली?जो कहती थी “हम सब…

बाबा साहेब की विरासत पर सत्ता की सियासत, जयंती या सत्ता का स्वार्थी तमाशा?

बाबा साहब के विचारों—जैसे सामाजिक न्याय, जातिवाद का उन्मूलन, दलित-पिछड़ों को सत्ता में हिस्सेदारी, और संविधान की गरिमा की रक्षा—को आज के राजनेता पूरी तरह नजरअंदाज कर रहे हैं। राजनीतिक दल केवल वोट बैंक के लिए अंबेडकर की जयंती मनाते हैं, जबकि वे उनके विचारों से कोसों दूर हैं। जिन मुद्दों के लिए बाबा साहब…

सरकारी स्कूलों को बन्द करने की बजाय उनका रुतबा बढ़ाये। 

भारत में सरकारी स्कूल सामाजिक समानता और शिक्षा के अधिकार के प्रतीक हैं, लेकिन बजट कटौती, ढांचागत कमी और शिक्षकों की अनुपलब्धता ने इनकी साख गिराई है। हरियाणा इसका ताजा उदाहरण है, जहाँ 2022 में 292 स्कूल बंद हुए, और 2024 में 800 और स्कूलों को बंद करने की योजना है। सरकारें नामांकन की कमी…

सत्ता, शहादत और सवाल

क्यों जलियाँ की चीख सुन, सत्ता है अब मौन? लाशों से ना सीख ली, अब समझाये कौन॥ डायर केवल नाम था, सोच भरी है आज। वर्दी बदली, मन वही, वही लहू की लाज॥ सत्य कहे “गद्दार” हो, चुप रहकर हो “भक्त”।  लोकतंत्र है या यहाँ, जंजीरों का वक्त॥ लूटते भला किसान हो, या छात्र अनुद्रोह।…

नया भारत और फुले का सपना

“ज्योतिबा फुले का भारत बनाना अभी बाकी है” फुले केवल उन्नीसवीं सदी के समाज सुधारक नहीं थे, बल्कि वे आज भी जाति, लिंग और वर्ग आधारित असमानताओं के खिलाफ एक जीवंत विचारधारा हैं। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक समानता का हथियार बनाया, महिलाओं और दलितों के लिए स्कूल खोले, और ब्राह्मणवादी सत्ता संरचना को खुली चुनौती…

प्राइवेट सिस्टम का खेल : आम आदमी की जेब पर हमला

भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकार आज निजी संस्थानों के लिए मुनाफे का जरिया बन चुके हैं।  प्राइवेट स्कूल सुविधाओं की आड़ में अभिभावकों से मनमाने शुल्क वसूलते हैं—ड्रेस, किताबें, यूनिफॉर्म, कोचिंग—सब कुछ महँगा और अनिवार्य बना दिया गया है। वहीं, प्राइवेट हॉस्पिटल डर और भ्रम का माहौल बनाकर मरीजों से मोटी रकम…

आज के दौर में भगवान महावीर के विचारों की प्रासंगिकता

— एक नैतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण की पुकार आज के भौतिकवादी और असहिष्णु समय में भगवान महावीर के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। उन्होंने अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अस्तेय और ब्रह्मचर्य जैसे सिद्धांतों के माध्यम से आत्म-शुद्धि और सामाजिक सद्भाव का मार्ग दिखाया। उनके विचार उपभोक्तावाद, हिंसा, पर्यावरण विनाश और नैतिक पतन जैसी समकालीन…