झूठी-साज़िश गढ़ रहे, , फैलाएँ भ्रम-जाल। सजग रहे जन-गण सभी, विफल करें हर चाल॥
सदा देश की एकता, इनको अखरे पार्थ। भेदभाव की आग से, सेके अपना स्वार्थ॥ राष्ट्रहितों को छोड़कर, करते केवल शोर। जनता समझे भेद सब, अब न चलेगा जोर॥ बात-बात पर खोजते, नित नया विवाद। मिल-जुलकर रहना मगर, देश रहे आबाद॥ स्वार्थ-सिद्धि की चाह में, बाँटें जाति-समाज। प्रेम-सद्भावों से बने, भारत का सिरताज॥ अफवाहों के पंख…
