व्यवस्था की शाही सुस्ती और राख होता बचपन
बृजेश चतुर्वेदी
लखनऊ।(आवाज न्यूज़ ब्यूरो )। अलीगंज में लगी आग ने सिर्फ एक इमारत को नहीं झुलसाया, बल्कि हमारे सिस्टम के उस खोखलेपन को भी बेनकाब कर दिया जो कागजों पर तो चाक-चौबंद है, लेकिन जमीन पर पूरी तरह पंगु। 15 मासूम छात्र, जिनके कंधों पर उनके परिवारों का भविष्य टिका था, आज प्रशासनिक संवेदनहीनता की भेंट चढ़ गए। यह सोची-समझी लापरवाही से की गई एक सामूहिक हत्या है, जिसके घाव कभी नहीं भरेंगे।
आग लगने की पुख्ता सूचना पाकर हमारी मुस्तैद पुलिस मौके पर पहुंच तो गई, लेकिन हाथों में डंडे और आंखों में रीढ़हीन बेबसी लिए। जब दूसरी मंजिल की खिड़कियों से बच्चे जिंदगी की भीख मांग रहे थे, तब हमारी पुलिस पूरे 15 मिनट तक बाहर खड़े होकर आग की लपटों का जायजा ले रही थी। शायद वे इस बात का वैज्ञानिक अध्ययन कर रहे थे कि आग कितनी तेजी से फैलती है! गजब की दूरदर्शिता है। जिस पुलिस को आपातकाल की सूचना दी गई, वह अपने साथ एक अदद रस्सी या सीढ़ी तक लाने की जहमत नहीं उठा सकी। क्या हमारे फर्स्ट रिस्पॉन्डर्स सिर्फ वीआईपी दौरों में रास्ता साफ करने और मूकदर्शक बनने के लिए ही भर्ती किए जाते हैं?
जब तड़पते बच्चों को बचाने के लिए एक-एक सेकंड की जंग चल रही थी, तब हमारी दमकल की गाड़ियों को मौके पर पहुंचने में आधा घंटा लग गया। हद तो तब हो गई जब जीवनदायिनी एंबुलेंस पूरे 40 मिनट की शाही देरी के बाद तशरीफ लाई। शायद हमारे तंत्र के लिए ट्रैफिक जाम और कागजी औपचारिकताएं, उन जलते हुए फेफड़ों की आखिरी सांसों से ज्यादा कीमती थीं। समय की इस कद्र पर जितना रोया जाए, उतना कम है।
जिस इमारत में यह मौत का तांडव हुआ, वहाँ दूसरी मंजिल से सुरक्षित उतरने के लिए कोई सीधी सीढ़ी या इमरजेंसी एग्जिट तक नहीं था। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि भ्रष्टाचार की कौन सी घुट्टी पीकर हमारे विकास प्राधिकरण और फायर विभाग ने इस मौत के कुएं को अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) बांट दिया? आज उन दफ्तरों के एयर-कंडीशंड कमरों में बैठे अफसरों के हाथ भी उन बच्चों के खून से रंगे हैं।
आज 15 परिवारों के चिराग हमेशा के लिए बुझ चुके हैं। मां-बाप के आंसुओं से सने ये सवाल किसी बहरे सिस्टम के कानों तक पहुंचेंगे या हर बार की तरह एक खोखली जांच कमेटी का गठन करके इस राख के नीचे सच को दबा दिया जाएगा? सिस्टम की इस क्रूर लेट-लतीफी ने आज हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अगली बार जब कोई आपदा आएगी, तो हम भगवान भरोसे रहेंगे या उस लाचार प्रशासन के भरोसे जो खुद एक अदद रस्सी के लिए दूसरों का मुंह ताकता है।
