बसपा का आखिरी किला भी ढह गया, उमाशंकर सिंह के निधन से बलिया में खालीपन

‘‘योगी के भरोसेमंद, दयाशंकर के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी, त्रिभुवन राम के करीबी, सिंगापुर तक था धंधा, कैंसर ले गया, न दोस्त भी समझ पाए, न दुश्मन कभी हरा नहीं पाये’’
बृजेश चतुर्वेदी
लखनऊ।(आवाज न्यूज़ ब्यूरो)। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ नेता चुनाव नहीं लड़ते, वे अपना इलाका चलाते हैं। उमाशंकर सिंह ऐसे ही नेताओं में थे। बुधवार को कैंसर से उनकी मौत के साथ केवल एक विधायक नहीं गया, बल्कि पूर्वांचल की राजनीति का एक ऐसा केंद्र समाप्त हो गया, जिसके इर्दगिर्द वर्षों तक सत्ता, विपक्ष, अफसरशाही और कारोबार के समीकरण घूमते रहे। और स्थानीय राजनीति में परिवहन राज्यमंत्री दयाशंकर सिंह का सबसे बड़ा कांटा निकल गया। करीब ढाई वर्ष तक कैंसर से लड़ने के बाद उन्होंने दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में अंतिम सांस ली। अंतिम दिनों में वे ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित थे। बीमारी लगातार बढ़ती रही, इलाज देश और विदेश में चला, लेकिन अंततः राजनीति का यह मजबूत खिलाड़ी जिंदगी की सबसे कठिन लड़ाई हार गया।
उमाशंकर सिंह की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत यह थी कि वे पार्टी से बड़े नेता बन गए थे। थे बसपा में, लेकिन रसूख योगी के संबंधों से कायम था। 2022 में जब बहुजन समाज पार्टी पूरे उत्तर प्रदेश में लगभग साफ हो गई, तब रसड़ा से जीतकर वही विधानसभा पहुंचे। पूरी बसपा एक विधायक में सिमट गई और वह विधायक उमाशंकर सिंह थे। यह जीत केवल चुनावी नहीं थी, बल्कि यह उनके व्यक्तिगत जनाधार का प्रमाण थी।
बलिया की राजनीति में उनका नाम आते ही दूसरा नाम दयाशंकर सिंह का लिया जाता था। दोनों के बीच प्रतिद्वंद्विता किसी से छिपी नहीं थी। चुनाव हों, संगठन हो या स्थानीय शक्ति संतुलन, दोनों अलग-अलग ध्रुव बन चुके थे। दिलचस्प बात यह रही कि एक ओर दयाशंकर सिंह भारतीय जनता पार्टी की सरकार में मंत्री थे, वहीं दूसरी ओर बसपा विधायक उमाशंकर सिंह को लेकर यह धारणा लगातार बनी रही कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनसे सीधा संवाद रखते थे और उनकी सुरक्षा तथा सम्मान को लेकर विशेष संवेदनशील थे। राजनीतिक गलियारों में इसे पूर्वांचल की शक्ति संतुलन की रणनीति के रूप में भी देखा जाता रहा, हालांकि इस पर कभी कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं हुई।
उमाशंकर सिंह का प्रभाव केवल विधानसभा तक सीमित नहीं था। उनके व्यावसायिक हितों की चर्चा उत्तर प्रदेश से बाहर तक होती थी। उनके कारोबारी नेटवर्क और संसाधनों को लेकर समय-समय पर राजनीतिक सवाल उठते रहे। फरवरी 2026 में आयकर विभाग की कार्रवाई ने भी उन्हें राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया। उस समय यह भी सामने आया कि वे लंबे समय से कैंसर का इलाज करा रहे हैं। बीमारी के बावजूद उन्होंने सार्वजनिक जीवन से लगभग पूरी तरह दूरी नहीं बनाई।
उनकी राजनीतिक यात्रा इस बात का उदाहरण भी है कि उत्तर प्रदेश में केवल दल ही सब कुछ तय नहीं करते। कई बार व्यक्ति स्वयं एक संस्था बन जाता है। बसपा का संगठन कमजोर होता गया, लेकिन रसड़ा में उमाशंकर सिंह की पकड़ बनी रही। यही कारण था कि भाजपा की प्रचंड लहर और बसपा के लगातार कमजोर होते जनाधार के बावजूद वे अपनी सीट बचाते रहे।
अब उनके निधन के बाद सबसे बड़ा प्रश्न बसपा के सामने खड़ा है। विधानसभा में उसका प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया है। रसड़ा में पैदा हुआ राजनीतिक शून्य कौन भरेगा, यह आने वाला समय बताएगा लेकिन इतना तय है कि पूर्वांचल की राजनीति में उमाशंकर सिंह जैसी स्वतंत्र राजनीतिक हैसियत वाले नेताओं की संख्या लगातार घटती जा रही है।
उमाशंकर सिंह अपने साथ कई सवाल भी छोड़ गए हैं। कैसे एक विपक्षी विधायक सत्ता के शीर्ष नेतृत्व से संवाद बनाए रखता है? कैसे एक ऐसा नेता, जिसके पास अपना मजबूत राजनीतिक और आर्थिक आधार हो, अपनी पार्टी से भी बड़ा चेहरा बन जाता है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या बसपा अब ऐसा दूसरा चेहरा तैयार कर पाएगी? इन सवालों के जवाब भविष्य देगा। फिलहाल इतना निश्चित है कि बलिया ने अपना सबसे प्रभावशाली राजनीतिक खिलाड़ी खो दिया है और उत्तर प्रदेश विधानसभा ने ऐसा विधायक, जो अकेला होकर भी पूरी पार्टी का चेहरा था।