साध्वी बनने का नया ट्रेंड : त्याग की ओट में सुख का ब्रांड?

 प्रियंका सौरभ ‘नई दिल्ली। (आवाज न्यूज ब्यूरो)। बचपन में हम सुनते थे कि साध्वी वह होती है जो मोह, माया, श्रृंगार, आकर्षण और सांसारिक जिम्मेदारियों से ऊपर उठ गई हो। वह जो खुद को समर्पित कर दे — ध्यान, साधना और आत्मा के शुद्धिकरण के लिए। आज की दुनिया में जब हम ‘साध्वी’ शब्द सुनते हैं,…

दिमागी रेबीज यानी इंसान से दूरी, कुत्ते से करीबी   

 डॉ सत्यवान सौरभ नई दिल्ली। (आवाज न्यूज ब्यूरो)। हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ लोग अपनी मां को वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं, लेकिन कुत्तों के लिए मखमली बिस्तर खरीदते हैं। जहाँ बच्चे की फीस चुकाना कठिन होता है, पर पालतू जानवर के लिए सालगिरह पार्टी देना ‘प्यारा’ माना जाता है। यह वह युग…

बदन की नहीं, बुद्धि की बनाओ पहचान बहनों : अश्लीलता की रील संस्कृति पर एक सवाल

 प्रियंका सौरभ नई दिल्ली। (आवाज न्यूज ब्यूरो)। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ स्क्रीन पर दिखना असल में जीने से ज़्यादा जरूरी हो गया है। जहां ज़िंदगी कैमरे के फ्रेम में सिमट गई है, और इंसान का मूल्य उसके ‘लाइक’, ‘फॉलोवर’ और ‘व्यूज़’ से तय होता है। इसी डिजिटल होड़ में स्त्रियों की…

कोख में कत्ल होती बेटियाँ : हरियाणा की घुटती संवेदना

बेटी भ्रूण हत्या : आँकड़े नहीं, संवेदना की चीख हरियाणा में केवल तीन महीनों में एक हज़ार एक सौ चौवन गर्भपात। कारण – कन्या भ्रूण हत्या की आशंका। छप्पन आशा कार्यकर्ताओं को कारण बताओ नोटिस। निगरानी प्रणाली में चूक। पश्च परीक्षण प्रणाली और पुलिस के सहयोग से कठोर कार्यवाही की तैयारी। किन्तु क्या यह सख़्ती…

प्रजापति समाज के अनमोल रत्न: डॉ. सत्यवान सौरभ और प्रियंका सौरभ

(दक्ष प्रजापति जयंती विशेष)  “प्रेरणा के प्रतीक: प्रजापति समाज के साहित्यिक रत्न” नई दिल्ली।(आवाज न्यूज ब्यूरो)। डॉ. सत्यवान सौरभ और प्रियंका सौरभ, प्रजापति समाज के ऐसे साहित्यिक रत्न हैं जिन्होंने लेखनी के माध्यम से समाज, संवेदना और चेतना को नई दिशा दी है। गाँव की मिट्टी से निकली उनकी रचनाएं आज राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हैं।…

पीछे नहीं, बराबरी में : केरल के स्कूलों की नई बैठने की व्यवस्था एक क्रांतिकारी कदम

(लेखिका: प्रियंका सौरभ) नई दिल्ली।(आवाज न्यूज ब्यूरो)। भारत के शिक्षा तंत्र में दशकों से एक अदृश्य रेखा बनी रही है — आगे की बेंच और पीछे की बेंच। जहाँ आगे की बेंच पर बैठने वाले छात्र अक्सर “मेधावी” माने जाते हैं, वहीं पीछे की बेंच को उपेक्षा और उपहास का प्रतीक समझा जाता है। लेकिन केरल…

जब छात्र हत्यारे बन जाएं : चेतावनी का वक्त

“संवाद का अभाव, संस्कारों की हार, स्कूलों में हिंसा समाज की चुप्पी का फल” हिसार में शिक्षक जसवीर पातू की हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि हमारे समाज की संवादहीनता, विफल शिक्षा व्यवस्था और गिरते नैतिक मूल्यों का कठोर प्रमाण है। आज का किशोर मोबाइल की आभासी दुनिया में जी रहा है, जबकि घर…

गुरु दक्ष प्रजापति : सृष्टि के अनुशासन और संस्कारों के प्रतीक

‘‘गुरू पूर्णिमा पर विशेष‘‘ सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के पुत्र गुरु दक्ष प्रजापति वेदों, यज्ञों और परिवार प्रणाली के आधार स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने अनुशासन और मर्यादा को समाज में स्थापित किया, किन्तु शिव-सती प्रसंग के माध्यम से यह भी दिखाया कि कठोरता से प्रेम मर जाता है। आज की पीढ़ी के लिए उनका जीवन-संदेश यह…

धर्मांतरण का धंधा : विदेशी फंडिंग और सामाजिक विघटन का षड्यंत्र

उत्तर प्रदेश में एटीएस ने एक बड़े धर्मांतरण रैकेट का खुलासा किया है, जिसमें विदेशी फंडिंग के जरिए करीब 100 करोड़ रुपये 40 खातों में भेजे गए। मुख्य आरोपी ‘छांगरू बाबा’ उर्फ जमशेदुद्दीन के नेतृत्व में यह गिरोह ऊंची जाति की लड़कियों के लिए 15-16 लाख रुपये की दर से धर्मांतरण कराता था। यह मामला…

बचपन को अख़बारों में जगह क्यों नहीं ?

रविवार की सुबह बेटे प्रज्ञान को गोद में लेकर अख़बार से कोई रोचक बाल-कहानी पढ़ाने की इच्छा अधूरी रह गई। किसी भी प्रमुख अख़बार में बच्चों के लिए एक भी रचना नहीं थी। समाज बच्चों को पढ़ने के लिए कहता है, पर उन्हें पढ़ने को क्या देता है? यह संपादकीय हमारे समाचार पत्रों की बच्चों…